प्रशासन और संस्कृति विभाग का सराहनीय प्रयास
Mandi, Dharamveer-:सैकड़ों वर्षों पुरानी मंडी कलम चित्रकला, जो कभी मंडी रियासत की पहचान हुआ करती थी, समय के साथ इतिहास के पन्नों में खोती चली गई। बदलते दौर, पाश्चात्य प्रभाव और संरक्षकों के अभाव में यह अनमोल कला लगभग विलुप्त हो चुकी थी। लेकिन अब जिला प्रशासन, भाषा एवं संस्कृति विभाग और कला संरक्षकों के संयुक्त प्रयासों से इस प्राचीन धरोहर को फिर से जीवित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं। इसी कड़ी में मंडी में एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया है, जिसमें 40 से अधिक युवा प्रतिभागी इस दुर्लभ कला का प्रशिक्षण ले रहे हैं।
मंडी कलम चित्रकला का इतिहास 18वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ है। उस दौर में यह कला तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और राजसी जीवन को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रमुख माध्यम थी। मंडी रियासत में विकसित हुई इस शैली की अपनी अलग पहचान थी, जो सूक्ष्म रेखाओं, प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक कागज के उपयोग के लिए जानी जाती थी। हालांकि 19वीं सदी में पाश्चात्य कला शैलियों के प्रभाव बढ़ने के साथ-साथ मंडी कलम धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई और अंततः इसके कलाकार भी समाप्त होते चले गए।
अब इस ऐतिहासिक कला को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से मंडी जिला प्रशासन और भाषा एवं संस्कृति विभाग ने मिलकर एक पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला शुरू की है। इस कार्यशाला में मंडी और कांगड़ा जिलों से जुड़े अनुभवी कलाकारों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया है, ताकि वे अपनी वर्षों की साधना और अनुभव को नई पीढ़ी तक पहुंचा सकें। प्रशिक्षण शिविर में भाग ले रहे युवाओं को मंडी कलम की बुनियादी तकनीकों से लेकर इसकी गहन बारीकियों तक की जानकारी दी जा रही है।इस अवसर पर उपायुक्त मंडी अपूर्व देवगन ने कहा कि मंडी कलम आज संरक्षण और संरक्षकों की सबसे अधिक जरूरत महसूस कर रही है। यह कार्यशाला इस दिशा में एक प्रारंभिक प्रयास है, लेकिन भविष्य में इसे और व्यापक स्तर पर ले जाने की योजना है, ताकि अधिक से अधिक युवा इस कला से जुड़ सकें और इसे आगे बढ़ा सकें।
कार्यशाला में मंडी के प्रसिद्ध कलाकार राजेश कुमार, कांगड़ा के सुशील कुमार, राजीव कुमार और संजीव कुमार जैसे अनुभवी कलाकार प्रशिक्षण दे रहे हैं। कलाकार राजेश कुमार ने बताया कि मंडी कलम एक मिनिएचर आर्ट है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विशेष पहचान रही है। उनका प्रयास है कि इस विलुप्तप्राय कला की हर बारीकी को भावी पीढ़ी तक पहुंचाया जाए, ताकि इसकी मौलिकता और गरिमा बनी रहे।
प्रशिक्षण ले रहे युवाओं में भी इस कला को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। प्रशिक्षु पल्लवी शर्मा और अश्वनी राणा का कहना है कि उन्हें ऐसी प्राचीन कला के बारे में जानने और सीखने का अवसर मिला है, जिसके बारे में पहले सिर्फ सुना ही था। उन्होंने इसके लिए प्रशिक्षकों के साथ-साथ जिला प्रशासन और भाषा एवं संस्कृति विभाग का आभार जताया।उल्लेखनीय है कि हाल के वर्षों में मंडी कलम के कुछ दुर्लभ चित्र अंतरराष्ट्रीय बाजार में करोड़ों रुपये में बिके हैं। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि मंडी की यह प्राचीन कला आज भी विश्व स्तर पर सराही जाती है। मंडी कलम चित्रकला में केवल प्राकृतिक कागज, पारंपरिक ब्रश और प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है, जो इसे अन्य चित्रकला शैलियों से अलग बनाता है।यदि इस तरह के प्रयास निरंतर जारी रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब मंडी कलम एक बार फिर अपनी खोई हुई पहचान हासिल करेगी और आने वाली पीढ़ियां इस अनमोल सांस्कृतिक विरासत पर गर्व कर सकेंगी।