Mandi, Dharamveer-:माइनस डिग्री तापमान, तेज़ तूफानी हवाएं और लगातार हो रही बर्फबारी भी देव आस्था के आगे बेबस नजर आईं। हिमाचल प्रदेश की देवभूमि पराशर ऋषि में देव परंपराओं का अद्भुत नजारा उस समय देखने को मिला, जब कठिन मौसम के बावजूद देव चंडोही गणपति की विशेष पूजा पूरी विधि-विधान से संपन्न हुई।
पराशर ऋषि में संपन्न हुई देव चंडोही गणपति की विशेष पूजा
पराशर ऋषि के विशेष निमंत्रण पर औट तहसील की स्नोर घाटी से देव चंडोही गणपति करीब 250 देवलुओं और कारदारों के साथ दो दिन पहले पराशर पहुंचे थे। पूजा अनुष्ठान का समय निर्धारित था, लेकिन ठीक पूजा से पहले तड़के करीब 5 बजे पराशर क्षेत्र में बर्फबारी शुरू हो गई। मौसम अचानक बिगड़ गया और तेज हवाओं के साथ भारी ठंड पड़ने लगी।इसके बावजूद देवलुओं की आस्था में कोई कमी नहीं आई। आसमान से गिरती बर्फ और तूफानी हवाओं के बीच देव परंपरा के अनुसार सभी धार्मिक रस्में पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ निभाई गईं। देव चंडोही गणपति की विशेष पूजा, हवन और अर्चना पराशर ऋषि के दरबार में संपन्न हुई। यह दृश्य साबित करता है कि हिमाचल को देवभूमि यूं ही नहीं कहा जाता, बल्कि यहां के लोगों की देवी-देवताओं के प्रति अटूट आस्था ही इसकी पहचान है।
पूजा के उपरांत देवी-देवताओं के आदेशानुसार देव चंडोही गणपति अपने कारदारों और देवलुओं के साथ बर्फबारी के बीच ही वापस स्नोर घाटी की ओर रवाना हो गए। देवता के कारदार सूर्याकांत शर्मा ने बताया कि देव पराशर ऋषि के विशेष आमंत्रण पर यह यात्रा की गई थी और सभी धार्मिक अनुष्ठान विधिवत रूप से पूरे किए गए।गौरतलब है कि देव चंडोही गणपति औट तहसील के अंतर्गत स्नोर घाटी से आते हैं, जो जिला मुख्यालय मंडी से लगभग 63 किलोमीटर दूर स्थित है। वहीं पराशर ऋषि का प्राचीन मंदिर मंडी जिला मुख्यालय से करीब 56 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और यह स्थल लगभग 9,000 फीट की ऊंचाई पर बसा हुआ है।
पराशर ऋषि के नाम पर स्थित प्रसिद्ध पराशर झील भी इस स्थल की पहचान है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ऋषि पराशर ने यहां तपस्या की थी। मंदिर का निर्माण 13वीं-14वीं शताब्दी में मंडी रियासत के राजा बानसेन द्वारा करवाया गया था। मंदिर समिति अध्यक्ष बलवीर ठाकुर ने बताया कि इस समय पराशर क्षेत्र में एक से डेढ़ फीट तक बर्फ जम चुकी है, फिर भी पूजा अनुष्ठान सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।