नई दिल्ली। उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में वीआईपी दर्शन को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए उसे खारिज कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कहा कि किसी मंदिर में किस तरह का दर्शन होगा और किसे गर्भगृह में प्रवेश मिलेगा, यह तय करना अदालत का काम नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में न्यायपालिका के हस्तक्षेप की एक सीमा होती है, जिसे पार नहीं किया जा सकता।
यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया, जिसमें जस्टिस एन. महादेवन और जस्टिस जॉयमाला बागची भी शामिल थे। याचिकाकर्ता दर्पण अवस्थी ने याचिका के माध्यम से महाकालेश्वर मंदिर में वीआईपी दर्शन व्यवस्था को संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया था। इससे पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी इसी याचिका को खारिज कर दिया था, जिसके बाद इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि मंदिर के गर्भगृह में चुनिंदा लोगों को प्रवेश की अनुमति दी जाती है, जबकि आम श्रद्धालुओं को दूर से ही दर्शन करने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी वीआईपी को प्रशासनिक आदेश के तहत गर्भगृह में जाने की अनुमति है, तो आम नागरिकों को भी वही अधिकार मिलना चाहिए। यह व्यवस्था भेदभावपूर्ण है और समान नियम सभी पर लागू होने चाहिए।
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यदि अदालतें यह तय करने लगें कि मंदिर में कौन प्रवेश करेगा और कौन नहीं, तो न्यायपालिका पर अत्यधिक बोझ बढ़ जाएगा। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि आज अनुच्छेद 14 की बात हो रही है, कल अनुच्छेद 19 के तहत अन्य मांगें सामने आ सकती हैं, जो न्यायिक व्यवस्था के दायरे से बाहर हैं। कोर्ट ने साफ किया कि इस तरह के निर्णय संबंधित प्रशासन और मंदिर प्रबंधन के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, न कि अदालत के।