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केंद्रीय बजट 2026-27 से हिमाचल को झटका, पहाड़ी राज्यों की अनदेखी का आरोप — सीएम सुक्खू

Shimla, Sanju-:केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश किए गए वित्त वर्ष 2026-27 के आम बजट को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। जहां भारतीय जनता पार्टी इस बजट को सर्वस्पर्शी, विकासोन्मुख और समावेशी बता रही है, वहीं कांग्रेस शासित हिमाचल प्रदेश ने इसे राज्य के हितों के खिलाफ और अन्यायपूर्ण करार दिया है।

मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने इस बजट पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह बजट आम जनता, मध्यम वर्ग, किसानों, बागवानों और विशेष रूप से पहाड़ी राज्यों की आवश्यकताओं को पूरी तरह नजरअंदाज करता है। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश के लोगों को इस बजट से गहरी निराशा हुई है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि लगातार बढ़ती महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च और आम आदमी पर आर्थिक दबाव के बावजूद मध्यम वर्ग को आयकर में किसी भी तरह की राहत नहीं दी गई। यह बजट जमीनी हकीकत से कटा हुआ नजर आता है।

केंद्र सरकार पर संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी का आरोप

मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने केंद्र सरकार पर संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत राज्यों को विशेष अनुदान देने का प्रावधान है, जिसे राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) कहा जाता है। यह अनुदान वर्ष 1952 से लेकर 15वें वित्त आयोग तक लगातार राज्यों को मिलता रहा है, लेकिन पहली बार 16वें वित्त आयोग में इसे पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।उन्होंने बताया कि 15वें वित्त आयोग के कार्यकाल में हिमाचल प्रदेश को लगभग 37 हजार करोड़ रुपये का राजस्व घाटा अनुदान प्राप्त हुआ था। मुख्यमंत्री ने यह भी याद दिलाया कि जब 14वें वित्त आयोग की अवधि समाप्त होने के बाद 15वें वित्त आयोग की रिपोर्ट आने में देरी हुई थी, तब भी तत्कालीन भाजपा सरकार के समय अंतरिम व्यवस्था के तहत 11,431 करोड़ रुपये राज्यों को दिए गए थे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आरडीजी की समाप्ति से हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिरता पर गंभीर असर पड़ेगा। इससे न केवल आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं की आपूर्ति प्रभावित होगी, बल्कि विकासात्मक परियोजनाओं में निवेश भी बाधित होगा। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को अब सेवा वितरण और बढ़ते कर्ज के बीच कठिन फैसले लेने पड़ेंगे।मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि बार-बार तथ्यात्मक ज्ञापन, तकनीकी प्रस्तुतियां और संवाद के प्रयासों के बावजूद केंद्र सरकार और वित्त आयोग ने हिमाचल प्रदेश की विशेष परिस्थितियों को नजरअंदाज किया। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे यह धारणा मजबूत होती है कि भाजपा शासित केंद्र सरकार कांग्रेस शासित राज्यों के साथ भेदभावपूर्ण रवैया अपना रही है।

कृषि क्षेत्र को लेकर  बजट को निराशाजनक बताया

कृषि क्षेत्र को लेकर भी मुख्यमंत्री ने बजट को निराशाजनक बताया। उन्होंने कहा कि हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य की भौगोलिक परिस्थितियां और खेती की लागत मैदानी राज्यों से बिल्कुल अलग हैं, लेकिन बजट में इसका कोई प्रतिबिंब नहीं दिखता।

मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से सेब उत्पादकों का जिक्र करते हुए कहा कि सेब उद्योग हिमाचल की अर्थव्यवस्था में लगभग 5,000 करोड़ रुपये का योगदान देता है और हजारों परिवारों की आजीविका इससे जुड़ी है, लेकिन बजट में न तो सेब उत्पादकों के लिए कोई विशेष योजना है और न ही कोई नीति समर्थन। इसे उन्होंने बागवानों के साथ सीधा अन्याय बताया।

पर्यटन क्षेत्र को लेकर भी मुख्यमंत्री ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि पर्यटन हिमाचल प्रदेश की पहचान और रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है, लेकिन केंद्रीय बजट में इस क्षेत्र के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया।उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए बौद्ध सर्किट की घोषणा स्वागत योग्य है, लेकिन विश्व-प्रसिद्ध बौद्ध स्थलों वाले हिमाचल प्रदेश को इससे बाहर रखना स्पष्ट भेदभाव को दर्शाता है। पर्वतीय सड़कों के विकास की घोषणा तो की गई है, लेकिन इसके लाभ को भविष्य की अस्पष्ट नीतियों पर छोड़ दिया गया है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि रेलवे विस्तार की महत्वपूर्ण परियोजनाओं जैसे भानुपल्ली-बिलासपुर और बद्दी-चंडीगढ़ रेल लाइन के लिए बजट में कोई आवंटन नहीं किया गया। उन्होंने राज्यों की ऋण सीमा को तीन प्रतिशत से बढ़ाकर चार प्रतिशत करने की मांग भी दोहराई।उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार भले ही पूंजी निवेश की बात कर रही हो, लेकिन पहाड़ी राज्यों के लिए आपदा प्रबंधन, सड़क और रेल कनेक्टिविटी, जलविद्युत, पर्यटन और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए कोई ठोस सहायता नजर नहीं आती।

हिमालयी राज्यों के लिए दिया ये सुझाव

मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि हिमालयी राज्यों के लिए अलग आपदा जोखिम सूचकांक और पारिस्थितिक संकेतकों को वित्तीय वितरण में प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि राज्यों को दिए जाने वाले ब्याज-मुक्त ऋण की सीमा 1.5 लाख करोड़ रुपये पर ही स्थिर रखी गई है और इसमें कोई वृद्धि नहीं की गई।मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि जीएसटी मुआवजा समाप्त होने से हिमाचल प्रदेश को हर वर्ष भारी राजस्व नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में यह बजट जन-विरोधी, किसान-विरोधी और हिमाचल-विरोधी साबित हो रहा है।उन्होंने कहा कि हिमाचल सरकार वित्तीय अनुशासन और प्रशासनिक दक्षता के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, लेकिन केंद्र सरकार से अपेक्षा है कि वह संवाद, संवेदनशीलता और सहकारी संघवाद की भावना को अपनाए। मुख्यमंत्री ने दो टूक कहा कि हिमाचल प्रदेश को नजरअंदाज कर देश का समावेशी विकास संभव नहीं है और राज्य सरकार प्रदेशवासियों के अधिकारों के लिए अपनी आवाज मजबूती से उठाती रहेगी।

Chandrika

chandrika@summerexpress.in

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