कांगड़ा, संजीव-:देवभूमि हिमाचल के कांगड़ा जिला के इंदौरा उपमंडल में व्यास नदी और छौंछ खड्ड के संगम के समीप स्थित काठगढ़ महादेव मंदिर आस्था और रहस्य का अद्वितीय केंद्र बना हुआ है। यहां स्थापित स्वयंभू अर्धनारीश्वर शिवलिंग को लेकर ऐसी मान्यता है, जो हर वर्ष महाशिवरात्रि पर हजारों श्रद्धालुओं को यहां खींच लाती है।
मंदिर में विराजमान शिवलिंग दो स्पष्ट भागों में विभाजित है—ऊंचा भाग भगवान शिव और छोटा भाग माता पार्वती का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण इसे अर्धनारीश्वर स्वरूप कहा जाता है। मान्यता है कि वर्षभर दोनों भागों के बीच हल्की दूरी बनी रहती है, लेकिन महाशिवरात्रि की पावन रात्रि में यह दूरी कम हो जाती है। श्रद्धालु इसे शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक मानते हैं।मंदिर के पुजारी महंत कालीदास के अनुसार, यह स्वयंभू अर्धनारीश्वर शिवलिंग शास्त्रों में वर्णित शिव-शक्ति की एकता का जीवंत प्रतीक है। शिवरात्रि पर यहां विशेष पूजन, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक किया जाता है। उनका कहना है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य फल देती है, इसलिए दूर-दूर से श्रद्धालु इस दिन दर्शन के लिए पहुंचते हैं।श्रद्धालुओं की आस्था भी इस धाम से गहराई से जुड़ी है। एक श्रद्धालु ने बताया कि वह हर वर्ष परिवार सहित यहां आते हैं और शिवरात्रि की रात का वातावरण अद्भुत और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर होता है। वहीं पंजाब से आए एक अन्य श्रद्धालु ने कहा कि अर्धनारीश्वर रूप के दर्शन दुर्लभ हैं और यहां आकर आत्मिक शांति मिलती है।
इस वर्ष 14 से 16 फरवरी तक यहां तीन दिवसीय जिला स्तरीय महोत्सव आयोजित किया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश के अलावा पंजाब, हरियाणा और जम्मू से भी हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। मंदिर परिसर ‘बम-बम भोले’ के जयकारों से गूंज उठेगा।
इतिहास की दृष्टि से भी यह मंदिर अत्यंत महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि भगवान शिव यहां आदि-अनादि ज्योति स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे। कहा जाता है कि सिकंदर महान ने यहां की दिव्यता से प्रभावित होकर चारदीवारी बनवाई, जबकि महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।महाशिवरात्रि पर काठगढ़ धाम केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और आध्यात्मिक अनुभूति का संगम बन जाता है।