नई दिल्ली। दशकों तक हिंद महासागर को दुनिया के सबसे खारे समुद्री क्षेत्रों में गिना जाता रहा है, लेकिन अब इसकी स्थिति तेजी से बदल रही है। एक नए अध्ययन में सामने आया है कि दक्षिणी हिंद महासागर के कुछ हिस्सों में पानी का खारापन लगातार कम हो रहा है, जो आने वाले समय में वैश्विक जलवायु और भारत के मानसून पर बड़ा असर डाल सकता है।
कोलोराडो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट से दूर दक्षिणी हिंद महासागर का खारापन पिछले 60 वर्षों में करीब 30 प्रतिशत तक घट चुका है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव समुद्री धाराओं, मौसम प्रणाली और समुद्री जीवन के लिए गंभीर संकेत है।
जलवायु परिवर्तन को माना गया मुख्य कारण
शोधकर्ताओं ने कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए निष्कर्ष निकाला कि खारेपन में गिरावट के पीछे जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग सबसे बड़ा कारण है। रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ते तापमान के कारण हिंद महासागर और उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के ऊपर चलने वाली सतही हवाओं के पैटर्न में बदलाव हो रहा है।
इन बदली हुई हवाओं की वजह से समुद्री धाराएं हिंद महासागर के मीठे पानी वाले क्षेत्रों से ज्यादा पानी को दक्षिणी हिस्सों की ओर ले जा रही हैं। इससे समुद्री जल में लवणता घट रही है और साथ ही पानी का घनत्व भी कम होता जा रहा है।
भारत के मानसून पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों के अनुसार हिंद महासागर में हो रहे ये बदलाव भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। समुद्र में लवणता और धाराओं में परिवर्तन से मानसून के पैटर्न, बारिश की तीव्रता और समय, साथ ही तटीय इलाकों के मौसम पर असर पड़ सकता है।
इसके अलावा, यह बदलाव समुद्री मत्स्य पालन और तटीय अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है, क्योंकि समुद्र के तापमान और पोषक तत्वों के प्रवाह में भी बदलाव आने की आशंका है।
वैश्विक जलवायु पर भी असर की आशंका
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि समुद्रों की धाराएं एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। ऐसे में हिंद महासागर के किसी हिस्से में होने वाला परिवर्तन यूरोप, एशिया और अफ्रीका के तापमान और मौसम प्रणाली को भी प्रभावित कर सकता है।
ओशन सर्कुलेशन सिस्टम हो सकता है कमजोर
विशेषज्ञों का कहना है कि लवणता में गिरावट से महासागरों की वह प्रणाली प्रभावित हो सकती है, जिसे पृथ्वी की “कन्वेयर बेल्ट” कहा जाता है। यह प्रणाली पूरी दुनिया में गर्मी, नमक और मीठे पानी का वितरण कर जलवायु को संतुलित बनाए रखती है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि समुद्री जल में औसतन लवणता लगभग 3.5 प्रतिशत होती है, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में यह स्तर अलग होता है। इसी अंतर के कारण महासागरीय सर्कुलेशन प्रणाली सक्रिय रहती है। अगर यह संतुलन बिगड़ता है, तो इसका असर पूरी दुनिया के मौसम चक्र पर पड़ सकता है।
फिलहाल वैज्ञानिक लगातार इस बदलाव पर नजर बनाए हुए हैं और इसे जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकेत के रूप में देखा जा रहा है।