पंचकूला। जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान 2016 में रोहतक में तत्कालीन वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु की कोठी में आगजनी और तोड़फोड़ के मामले में सीबीआई 10 साल बाद भी आरोप साबित नहीं कर पाई। विशेष केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो अदालत ने सभी 56 आरोपितों को बरी कर दिया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका। मामले में दर्ज 127 गवाहों के बयान, तकनीकी और फोरेंसिक साक्ष्य आरोपितों की भूमिका स्पष्ट रूप से प्रमाणित नहीं कर पाए। सुनवाई के दौरान तीन आरोपितों की मौत हो चुकी है, जबकि एक आरोपी को भगोड़ा घोषित किया गया।
इस मामले में तकनीकी साक्ष्य जैसे वीडियो फुटेज, सीसीटीवी रिकॉर्ड, मोबाइल लोकेशन और ज्वलनशील पदार्थ के अवशेष अदालत में निर्णायक नहीं साबित हुए। वीडियो में दिख रहे व्यक्तियों की पहचान आरोपितों से स्थापित नहीं हो सकी और डिजिटल साक्ष्यों की श्रृंखला भी पर्याप्त नहीं मानी गई।
मामला 27 फरवरी 2016 को दर्ज हुआ था। प्रारंभ में जांच रोहतक पुलिस ने की, बाद में यह मामला सीबीआई को सौंपा गया। फरवरी 2020 में अदालत ने राजद्रोह की धारा हटाकर आगजनी, दंगा और हत्या के प्रयास की धाराओं के तहत मुकदमा चलाया।
अदालत ने बताया कि घटना से जुड़े 491 गवाहों के बयान, सुरक्षा अधिकारी और विशेषज्ञों की रिपोर्ट, बीमा और सरकारी नुकसान रिपोर्टें भी रिकॉर्ड में शामिल की गईं। बावजूद इसके, सभी आरोपितों को साक्ष्यों की अपर्याप्तता के कारण बरी कर दिया गया।
इस फैसले से सीबीआई पर सवाल उठ रहे हैं कि 10 साल की लंबी जांच के बावजूद अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। अदालत का यह निर्णय जांच एजेंसी के सबूत जुटाने और उनका प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की चुनौती को उजागर करता है।
56 आरोपितों में मोहित, विजेंद्र सिंह, राजेश कुमार, जोगेंद्र, समुंद्र, राहुल दादू, महेंद्र सिंह, सुदीप कलकल, जगपाल सिंह, नरेंद्र, मनोज दुहन, अभिषेक, धमेंद्र, सुमित, नसीब, योगानंद, विकास, दीपक, प्रदीप, रविंद्र, अजय समेत अन्य शामिल थे।