Summer express, नई दिल्ली। बिजनेस डेस्क। वैश्विक अनिश्चितता के बीच सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोना और चांदी की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध के माहौल के बावजूद इन दोनों कीमती धातुओं में हाल के समय में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है, जिससे निवेशकों को झटका लगा है।
आंकड़ों के अनुसार, ईरान और अमेरिका-इजरायल तनाव की शुरुआत में सोने-चांदी की कीमतों में थोड़ी तेजी देखने को मिली थी, लेकिन इसके बाद से अब तक करीब 22 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। 2025 में बेहतर प्रदर्शन के बाद 2026 की शुरुआत में भी इन धातुओं ने रिकॉर्ड स्तर छुआ था, जहां जनवरी के अंत तक सोना लगभग 5,500 डॉलर प्रति औंस और चांदी 121 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई थी। हालांकि, जैसे-जैसे वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव आया और संघर्ष लंबा खिंचा, कीमतों में गिरावट शुरू हो गई।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस गिरावट के पीछे अमेरिकी डॉलर की मजबूती एक प्रमुख कारण रही है। युद्ध और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के चलते महंगाई की आशंका बढ़ी, जिससे डॉलर मजबूत हुआ। डॉलर मजबूत होने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना-चांदी महंगे हो जाते हैं, जिससे उनकी मांग प्रभावित होती है। मौजूदा समय में सोना करीब 16 प्रतिशत गिरकर लगभग 4,680 डॉलर प्रति औंस और चांदी करीब 35 प्रतिशत टूटकर 74 डॉलर प्रति औंस के आसपास आ गई है।
इसके अलावा, बढ़ती महंगाई की आशंका के चलते केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कम हो गई है। ऐसे में निवेशक सोना-चांदी जैसे गैर-उपज वाले निवेश से हटकर बॉन्ड और अन्य ब्याज देने वाले विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। ऊंची बॉन्ड यील्ड भी कीमती धातुओं पर दबाव बना रही है।
चांदी की कीमतों में अधिक गिरावट की एक वजह इसकी औद्योगिक मांग में कमी भी बताई जा रही है। वैश्विक अनिश्चितता के चलते कई उद्योगों में निवेश और उत्पादन योजनाएं प्रभावित हुई हैं, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर और ऑटो सेक्टर में मांग घटी है। चूंकि चांदी की बड़ी हिस्सेदारी औद्योगिक उपयोग से जुड़ी है, इसलिए इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ देशों द्वारा अपने स्वर्ण भंडार में बदलाव और बिकवाली भी बाजार में आपूर्ति बढ़ने का कारण बनी, जिससे कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐतिहासिक रूप से भी ऐसा देखा गया है कि किसी बड़े संघर्ष की शुरुआत में सोना-चांदी में तेजी आती है, लेकिन समय के साथ यह प्रभाव कम हो जाता है।
फिलहाल बाजार में भू-राजनीतिक तनाव की तुलना में आर्थिक कारकों का प्रभाव अधिक देखने को मिल रहा है। जब तक महंगाई के संकेत कमजोर नहीं होते और ब्याज दरों में नरमी नहीं आती, तब तक सोना-चांदी में बड़ी तेजी की संभावना सीमित मानी जा रही है।