Summer express, मोनिका रावत, चंडीगढ़, । पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार को बड़ी राहत देते हुए स्पष्ट किया है कि केवल 10 वर्ष की सेवा पूरी कर लेने मात्र से किसी कर्मचारी को नियमितीकरण का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने कहा कि प्रत्येक कर्मचारी के मामले की अलग-अलग समीक्षा की जाएगी और यह परखा जाएगा कि वह संबंधित नियमितीकरण नीति की शर्तों को पूरा करता है या नहीं।
जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए एकल पीठ के उस आदेश में संशोधन किया, जिसमें कर्मचारियों को नियमित करने के निर्देश दिए गए थे। सरकार ने दलील दी थी कि एकल पीठ ने कर्मचारियों की पात्रता और तथ्यों की व्यक्तिगत जांच किए बिना नियमितीकरण का आदेश पारित किया था।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि नियमितीकरण का लाभ तभी दिया जा सकता है, जब संबंधित कर्मचारी सरकार की निर्धारित नीति के तहत पात्र पाया जाए। केवल लंबी सेवा अवधि को नियमितीकरण का आधार नहीं माना जा सकता।
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया मदन सिंह बनाम हरियाणा राज्य फैसले और हाई कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकार को प्रत्येक कर्मचारी के दावे की व्यक्तिगत रूप से जांच करनी होगी और यह तय करना होगा कि वह लागू नीति के तहत नियमितीकरण का पात्र है या नहीं।
हालांकि अदालत ने कर्मचारियों को अंतरिम राहत भी दी है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक सरकार सभी मामलों में अंतिम निर्णय नहीं ले लेती, तब तक कर्मचारियों की वर्तमान सेवा स्थिति यथावत बनी रहेगी और उन्हें सेवा से नहीं हटाया जाएगा।
हाई कोर्ट का यह फैसला नियमितीकरण की मांग कर रहे हजारों कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि अब प्रत्येक मामले का निर्णय व्यक्तिगत पात्रता और लागू नीतियों के आधार पर किया जाएगा।