Summer express/शिमला, संजू -:हिमाचल प्रदेश की दुर्गम और अत्यधिक ऊंचाई वाली स्पीति घाटी में रहने वाले मूल निवासियों के बीच पित्त की पथरी (गॉलस्टोन) की बीमारी चिंताजनक स्तर पर पाई गई है। आईजीएमसी शिमला के विशेषज्ञों द्वारा किए गए एक जनसंख्या-आधारित अध्ययन में खुलासा हुआ है कि घाटी के हर पांच में से एक से अधिक वयस्क, यानी 21.3 प्रतिशत लोग गॉलस्टोन से प्रभावित हैं। यह आंकड़ा देश के अन्य क्षेत्रों में पहले दर्ज की गई दरों की तुलना में कई गुना अधिक है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह निष्कर्ष जनजातीय और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देता है।
यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल Cureus में “Prevalence and Factors of Gallstone Disease in the High-Altitude Tribal Population of Spiti Valley, Northern India: A Population-Based Cross-Sectional Study” शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। अध्ययन फरवरी 2024 से जनवरी 2026 के बीच किया गया और इसे हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद (HIMCOSTE) ने वित्तपोषित किया। शोध कार्य को आईजीएमसी शिमला की मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च यूनिट (MRU) का सहयोग भी मिला।शुक्रवार को आयोजित पत्रकार वार्ता में अध्ययन का नेतृत्व करने वाले डॉ. विपिन शर्मा ने बताया कि यह अपनी तरह का पहला व्यापक फील्ड-आधारित अध्ययन है। केवल अस्पतालों के रिकॉर्ड या मरीजों की स्वयं दी गई जानकारी पर निर्भर रहने के बजाय विशेषज्ञों की टीम अल्ट्रासाउंड मशीनों के साथ सीधे स्पीति घाटी के दूरस्थ गांवों तक पहुंची। टीम ने दुनिया के सबसे ऊंचे बसे गांवों में शामिल हिक्किम और कोमिक सहित विभिन्न क्षेत्रों में जाकर लोगों की ऑन-साइट जांच की।
अध्ययन में 30 से 70 वर्ष आयु वर्ग के 450 मूल निवासियों को शामिल किया गया। सभी प्रतिभागियों का मौके पर ही पेट का अल्ट्रासाउंड किया गया, जिससे गॉलस्टोन की वास्तविक स्थिति का पता लगाया जा सका। जांच में 21.3 प्रतिशत प्रतिभागियों में पित्त की पथरी पाई गई। यह दर उत्तर भारत के गंगा के मैदानी ग्रामीण क्षेत्रों में दर्ज 4.15 प्रतिशत और कश्मीर में पाए गए 6.12 प्रतिशत के मुकाबले काफी अधिक है।शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी रहा कि केवल अधिक ऊंचाई पर रहना गॉलस्टोन का प्रत्यक्ष कारण नहीं है। अध्ययन में बढ़ती उम्र, महिला होना और फैटी लीवर को बीमारी के प्रमुख स्वतंत्र जोखिम कारक माना गया है। विशेषज्ञों ने बताया कि अध्ययन के दौरान प्रतिभागियों को ऊंचाई के आधार पर तीन समूहों में बांटा गया। कम ऊंचाई वाले क्षेत्र में 24 प्रतिशत, मध्य ऊंचाई वाले क्षेत्र में 24.7 प्रतिशत और अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र में 15.3 प्रतिशत लोगों में गॉलस्टोन पाया गया। इससे स्पष्ट हुआ कि ऊंचाई की तुलना में अन्य जैविक और जीवनशैली संबंधी कारण अधिक प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं।
डॉ. विपिन शर्मा ने कहा कि इस अध्ययन के परिणाम भविष्य की स्वास्थ्य नीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने बताया कि यदि समय रहते गॉलस्टोन की पहचान और उपचार नहीं किया गया तो इससे कई गंभीर जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। इनमें पित्ताशय में सूजन (एक्यूट कोलेसिस्टाइटिस), अग्नाशयशोथ (पैंक्रियाटाइटिस), प्रतिरोधी पीलिया और बार-बार होने वाला तेज पित्त दर्द शामिल हैं। उन्होंने आगाह किया कि दूरस्थ क्षेत्रों में समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध न होने के कारण मरीजों में जटिलताओं का खतरा और बढ़ जाता है।विशेषज्ञों ने यह भी आशंका जताई कि लंबे समय तक अनुपचारित रहने वाले मामलों में पित्ताशय के कैंसर का जोखिम भी बढ़ सकता है। ऐसे में स्पीति जैसे जनजातीय और दुर्गम क्षेत्रों में प्रारंभिक जांच और समय पर उपचार की व्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक है।
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि जनजातीय और उप-हिमालयी क्षेत्रों में नियमित अल्ट्रासाउंड स्क्रीनिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जाए। साथ ही हेपेटोबिलियरी सर्जिकल सेवाओं को जिला और क्षेत्रीय स्तर तक सुदृढ़ किया जाए, ताकि मरीजों को समय पर उपचार मिल सके। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में खान-पान, आनुवंशिक प्रवृत्ति और जीवनशैली से जुड़े कारकों पर बड़े स्तर पर शोध किए जाने की आवश्यकता है, जिससे इस बीमारी के वास्तविक कारणों को और बेहतर तरीके से समझा जा सके।अध्ययन दल में डॉ. विपिन शर्मा के अलावा डॉ. विपन कुमार, डॉ. सुषमा मखैक, डॉ. संदीप रायता, डॉ. दिग्विजय ठाकुर, डॉ. चमन ठाकुर और डॉ. सुधाकर चुघ शामिल रहे। पत्रकार वार्ता के दौरान आईजीएमसी के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राहुल राव भी मौजूद रहे।