Summer express, पंचकूला | हरियाणा के पंचकूला में पुलिस हिरासत के दौरान आरोपियों के साथ कथित दुर्व्यवहार के मामले में अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। कालका के एसडीजेएम अभिमन्यु राजपूत की अदालत ने पिंजौर मर्डर केस के आरोपियों का जबरन सिर मुंडवाने, नंगे पैर सड़क पर घुमाने और सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने के आरोपों पर संज्ञान लेते हुए पंचकूला पुलिस कमिश्नर को विभागीय जांच कराने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने तय समय में जांच रिपोर्ट पेश करने को भी कहा है।
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि किसी भी आरोपी के साथ कानून से बाहर जाकर अमानवीय व्यवहार करना, कस्टडी में प्रताड़ित करना या उसका सार्वजनिक ‘मीडिया ट्रायल’ करना न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है।
दरअसल यह मामला को पिंजौर के मुख्य बाजार में हुए जितेश मनोचा उर्फ किट्टू हत्याकांड से जुड़ा है। इस मामले में पुलिस ने छह आरोपियों को गिरफ्तार किया था। इनमें से आरोपी रोहित मेहता ने अदालत में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि पुलिस हिरासत के दौरान उसके और अन्य आरोपियों के बाल जबरन काटे गए, मारपीट की गई और उन्हें नंगे पैर सड़कों पर घुमाकर वीडियो और तस्वीरें वायरल की गईं। याचिका में संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई और मेडिकल जांच की मांग की गई थी।
अदालत के निर्देश पर गठित तीन सदस्यीय मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में आरोपियों खुशदीप सिंह, रोहित मेहता और मनप्रीत सिंह के शरीर पर कुछ दिन पुरानी सामान्य चोटों के निशान मिलने की पुष्टि हुई है। हालांकि किसी गंभीर फ्रैक्चर की पुष्टि नहीं हुई।
सुनवाई के दौरान अदालत ने जब सीसीटीवी फुटेज मांगी तो क्राइम ब्रांच और चंडीमंदिर इकाई के तत्कालीन प्रभारियों ने लिखित जवाब में कहा कि संबंधित परिसर में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे थे, इसलिए फुटेज उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।
वहीं पुलिस ने अदालत में दलील दी कि दो आरोपी हिरासत से भागने की कोशिश कर रहे थे, जिसके दौरान उन्हें चोटें लगीं। पुलिस के अनुसार इस संबंध में अलग से एफआईआर भी दर्ज की गई है। साथ ही पुलिस ने कहा कि आरोपियों को साक्ष्य जुटाने और निशानदेही के लिए बाहर ले जाना जांच प्रक्रिया का हिस्सा था।
हालांकि अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी आरोपी का उसकी इच्छा के विरुद्ध सिर मुंडवाकर सार्वजनिक रूप से पेश करना बेहद गंभीर मामला है। कोर्ट ने कहा कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच जरूरी है ताकि सच्चाई सामने आ सके और यदि कोई अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसकी जवाबदेही तय की जा सके।