सोलन/चंद्रिका। हिमाचल प्रदेश की पहचान केवल इसकी प्राकृतिक सुंदरता से ही नहीं, बल्कि यहां की समृद्ध देव संस्कृति, लोकपरंपराओं, लोकगाथाओं और लोकनाट्य परंपराओं से भी है। इसी सांस्कृतिक विरासत की एक विशिष्ट कड़ी महासुवी क्षेत्र में प्रचलित डगेली नाच है। यह अनूठी स्वांग नृत्य परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के जन्म और उनकी बाल लीलाओं से जुड़ी लोकमान्यताओं के साथ-साथ हिमाचल की पारंपरिक देव आस्था और सामुदायिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती है।कृष्ण जन्माष्टमी के सात दिन बाद पंचांग के अनुसार त्रयोदशी और चतुर्दशी की रात्रियों में डगेली पर्व मनाने की परंपरा बताई जाती है। मान्यता के अनुसार एक रात महिला डागें और दूसरी रात पुरुष डागे नृत्य करते हैं। लोकगाथाओं में इस परंपरा को श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और कंस द्वारा भेजी गई दुष्ट शक्तियों से जोड़कर देखा जाता है।
लोकगाथाओं में कंस और दुष्ट शक्तियों का प्रसंग
जनश्रुतियों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद कंस ने उनके वध के लिए अनेक राक्षसों, राक्षसियों और तांत्रिक शक्तियों को भेजा। श्रीकृष्ण ने अपनी बाल लीलाओं के माध्यम से इन दुष्ट शक्तियों का संहार किया। लोककथाओं में पूतना जैसी राक्षसी और सिधड़ पांडा जैसे तांत्रिक का भी उल्लेख मिलता है। लोकविश्वास है कि इन शक्तियों ने श्रीकृष्ण से वर्ष में दो रात्रियों तक अपने भयावह रूप में नृत्य करने की अनुमति मांगी थी। इसी मान्यता को डगेली की दो रात्रियों की परंपरा से जोड़ा जाता है।
हिमाचली देव संस्कृति से गहरा जुड़ाव
डगेली पर्व में देवता के गुर, पांडे और पुरोहित की भूमिका विशेष मानी जाती है। देवशक्ति से मंत्रोच्चारित सरसों और चावल के दाने ग्रामीणों को वितरित किए जाते हैं। लोकविश्वास के अनुसार ये दाने नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करते हैं। घरों के मुख्य द्वार पर भेखल और टिम्बर की टहनियां लगाने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है।
हिमाचल की देव संस्कृति में देवता और समुदाय के बीच संबंध, गुर की भूमिका, लोकअनुष्ठान, सामूहिक आस्था और पारंपरिक संरक्षण की भावना महत्वपूर्ण मानी जाती है। डगेली नाच इसी व्यापक देवपरंपरा का एक लोक रूप माना जा सकता है, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ लोककला और सामुदायिक चेतना भी जुड़ी हुई है।
अदृश्य परंपरा को दिया मंचीय रूप
डगेली नाच से जुड़ी एक विशेष मान्यता यह है कि इसका वास्तविक स्वरूप सामान्य व्यक्ति को दिखाई नहीं देता। लोकविश्वास के अनुसार देवता के गुर अथवा विशेष आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न व्यक्ति ही इसका दर्शन कर सकते हैं। इसी कारण यह परंपरा लंबे समय तक लोकविश्वास और जनश्रुतियों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही।इस अदृश्य लोकपरंपरा को दृश्य एवं मंचीय स्वरूप प्रदान करने के उद्देश्य से पद्मश्री विद्यानंद सरैक एवं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लोक कलाकार डॉ. जोगेंद्र सिंह हाब्बी ने डगेली नाच का अध्ययन किया। उपलब्ध लोकजानकारियों और विभिन्न मान्यताओं के आधार पर इसे प्रतीकात्मक स्वांग नृत्य के रूप में विकसित किया गया। इसके लिए आवश्यक मुखौटों और परिधानों के निर्माण में गोपाल हाब्बी के मार्गदर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
लोकविरासत के संरक्षण का प्रयास
डगेली नाच को मंचीय रूप देने का उद्देश्य अंधविश्वास या भय को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि हिमाचल की उन लोकपरंपराओं को सांस्कृतिक मंच प्रदान करना है जो समय के साथ लोकस्मृति तक सीमित होती जा रही हैं। इसके माध्यम से डगेली से जुड़े भय के बजाय हिमाचल की देव आस्था, लोककला और सांस्कृतिक विरासत के सकारात्मक पक्ष को सामने लाने का प्रयास किया गया है।
डगेली नाच इस बात का उदाहरण है कि हिमाचल की देव संस्कृति केवल मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें लोकनृत्य, स्वांग, लोकगाथा, मुखौटा परंपरा, सामुदायिक विश्वास और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक स्मृतियां भी शामिल हैं। इस दृष्टि से डगेली नाच महासुवी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि हिमाचल की समृद्ध लोक एवं देव संस्कृति की अमूर्त विरासत को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम बनकर सामने आता है।