Summer express, महम। रोहतक जिले के महम में एक परिवार पर उस समय दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, जब उनकी डेढ़ साल की बेटी आस्था की मौत हो गई। बेटी को खोने के गहरे सदमे के बीच माता-पिता दीपक परूथी और रीना ने नेत्रदान का फैसला लेकर मानवता की मिसाल पेश की। परिवार को उम्मीद है कि उनकी बेटी की आंखों से दो अन्य बच्चों को दुनिया देखने का अवसर मिल सकेगा।
महम के वार्ड नंबर छह निवासी दीपक परूथी और उनकी पत्नी रीना के अनुसार, आस्था को पिछले दो दिनों से तेज बुखार था। बुखार के दौरान उसे उल्टियां भी हुईं। इसके बाद बच्ची की मौत हो गई। परिवार के लिए यह अपूरणीय क्षति है। इस मुश्किल घड़ी में भी माता-पिता ने बेटी की आंखें दान करने की इच्छा जताई और इसके लिए संबंधित चिकित्सकों से संपर्क किया।
परिवार का मानना है कि आस्था अब उनके बीच नहीं है, लेकिन उसकी आंखें किसी दूसरे बच्चे के जीवन में रोशनी ला सकती हैं। बेटी को खोने का दुख कम नहीं हो सकता, फिर भी उसके नेत्रों से किसी जरूरतमंद को दृष्टि मिलने की संभावना परिवार के लिए सांत्वना का आधार बनी है।
दीपक का परिवार डेरा सच्चा सौदा से जुड़ा हुआ है। डेरा अनुयायी रामदास इंसा ने बताया कि संस्था की ओर से लोगों को नेत्रदान के प्रति जागरूक किया जाता है। उनके अनुसार, महम में यह नेत्रदान का तीसरा मामला है। इससे पहले भी दो लोगों के नेत्रदान की प्रक्रिया करवाई जा चुकी है।
महम नगर पालिका के उपप्रधान बसंत लाल गिरधर भी लोगों को नेत्रदान और देहदान के लिए प्रेरित करते हैं। वे सामाजिक और पारिवारिक आयोजनों के दौरान लोगों को इस दिशा में आगे आने के लिए जागरूक करते हैं। उनका प्रयास है कि अधिक से अधिक लोग नेत्रदान के महत्व को समझें और जरूरतमंदों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में योगदान दें।
महज डेढ़ साल की आस्था का निधन परिवार के लिए ऐसा दुख है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। हालांकि, उसके माता-पिता का यह फैसला समाज को मानवीय संवेदना और नेत्रदान के महत्व का संदेश देता है। यदि दान किए गए नेत्र चिकित्सकीय रूप से प्रत्यारोपण के योग्य पाए जाते हैं, तो इससे जरूरतमंद बच्चों को दृष्टि मिलने की उम्मीद बन सकती है।