Summer express/शिमला-:हिमाचल प्रदेश में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को लेकर प्रदेश सरकार और शिक्षक संगठनों के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ (HPUTWA) ने राज्य सरकार के प्रस्तावित हिमाचल प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक, 2026 के विरोध में आंदोलन तेज करने का निर्णय लिया है। संघ ने सरकार से विधेयक पर पुनर्विचार करने और इसे लागू करने से पहले विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के साथ विस्तृत चर्चा करने की मांग उठाई है। मांगों पर सहमति नहीं बनने की स्थिति में संघ ने न्यायालय जाने के विकल्प पर भी विचार करने की बात कही है।
संघ के अध्यक्ष प्रो. नितिन व्यास ने कहा कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता केवल प्रशासनिक व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, शोध और नवाचार से है। विश्वविद्यालयों को मिलने वाली स्वायत्तता के कारण ही वे शैक्षणिक और शोध संबंधी निर्णय स्वतंत्र रूप से ले पाते हैं। ऐसे में प्रस्तावित संशोधन से प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है। उन्होंने कहा कि हिमाचल के विश्वविद्यालय कृषि, वानिकी और बागवानी सहित विभिन्न क्षेत्रों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
प्रो. व्यास के अनुसार, शिमला स्थित हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय पिछले करीब साढ़े पांच दशकों से प्रदेश में उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां विज्ञान, कला, विधि, गणित, भाषाओं, चिकित्सा, प्रशासन और राजनीति विज्ञान सहित अनेक विषयों में शिक्षा और शोध का कार्य हो रहा है। इन संस्थानों से शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी आज न्यायपालिका, स्वास्थ्य सेवाओं, प्रशासन, महाविद्यालयों, व्यापार और कृषि क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक गुणवत्ता बनाए रखने में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के निर्धारित मानकों और स्वायत्तता की अहम भूमिका रही है। सरकार यदि विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक और वित्तीय अधिकारों को सीमित करती है तो इसका असर संस्थानों की कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है।
संशोधन विधेयक के खिलाफ HPUTWA का मोर्चा
HPUTWA अध्यक्ष ने कहा कि राज्य सरकार वर्ष 1970 में बने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम सहित पुराने अधिनियमों में संशोधन करना चाहती है। सरकार की ओर से वित्तीय कुप्रबंधन और नियुक्तियों में निष्पक्षता सुनिश्चित करने जैसे तर्क दिए जा रहे हैं। हालांकि, संघ का मानना है कि कथित अनियमितताओं को दूर करने के लिए विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता समाप्त करना उचित समाधान नहीं है।उन्होंने सुझाव दिया कि शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्तियां प्रदेश लोक सेवा आयोग और राज्य चयन आयोग के माध्यम से करवाई जा सकती हैं। इससे नियुक्तियों में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित होगी। उन्होंने सवाल उठाया कि वित्तीय अधिकारों को सीमित कर वित्त सचिव को सौंपने से विश्वविद्यालयों की समस्याओं का समाधान कैसे होगा।
प्रो. व्यास ने यह भी कहा कि कुलपति, प्रति-कुलपति, कार्यकारी परिषद के प्रतिनिधियों, रजिस्ट्रार और वित्त अधिकारियों की नियुक्तियों में सरकार की भूमिका रहती है। ऐसे में विश्वविद्यालयों में होने वाली अनियमितताओं के लिए केवल संस्थानों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।इसी मुद्दे को लेकर प्रदेशभर के विश्वविद्यालयों के शिक्षक, गैर-शिक्षण कर्मचारी, शोधार्थी और पूर्व छात्र 5 नवंबर को सुबह 11 बजे विश्वविद्यालय परिसर में एकत्र होंगे। बैठक में संशोधन विधेयक के प्रावधानों पर चर्चा करने के साथ आंदोलन की आगामी रणनीति तय की जाएगी।