नई दिल्ली। I-PAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) से जुड़े छापे को लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य सरकार पर लगे आरोपों की गूंज अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि मामले की जांच की जाएगी और नोटिस जारी करने से रोका नहीं जा सकता।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ के समक्ष ईडी ने आरोप लगाया कि I-PAC कार्यालय और उसके निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर हुई छापेमारी के दौरान राज्य सरकार और मुख्यमंत्री ने जांच में हस्तक्षेप किया। ईडी का कहना है कि इससे केंद्रीय एजेंसियों का मनोबल प्रभावित होता है और गलत परंपरा स्थापित होती है।
ईडी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में दलील दी कि यह एक चिंताजनक पैटर्न को दर्शाता है, जहां जांच एजेंसियों के काम में बाधा डाली गई। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे मामलों में सख्त रुख नहीं अपनाया गया, तो भविष्य में केंद्रीय एजेंसियों के लिए काम करना और कठिन हो जाएगा। ईडी ने यह भी दावा किया कि I-PAC कार्यालय में आपत्तिजनक सामग्री मौजूद होने के संकेत मिले थे।
इससे पहले ईडी ने 9 जनवरी को कलकत्ता हाई कोर्ट में सीबीआई जांच की मांग की थी, लेकिन वहां सुनवाई हंगामे के कारण नहीं हो सकी थी। इसके बाद एजेंसी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने ईडी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जब्ती से जुड़ा दावा गलत है और इसका खंडन एजेंसी के अपने पंचनामा से होता है। उन्होंने इसे पूर्वाग्रह फैलाने की कोशिश बताया।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने टिप्पणी की कि दावे आपस में विरोधाभासी हैं और अदालत को तथ्यों की जांच करनी होगी। कोर्ट ने संकेत दिया कि मामले में नोटिस जारी कर आगे की कार्रवाई की जाएगी।