Kangra, Rahul-:मधुमक्खियां केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि खेती, स्वास्थ्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनती जा रही हैं। मधुमक्खियों का सबसे महत्वपूर्ण कार्य परागण है, जिसके माध्यम से फसलों की पैदावार में 20 से 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी होती है। यही वजह है कि मधुमक्खी पालन किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा रहा है।
आज के समय में मधुमक्खी पालन एक बहुआयामी आजीविका साधन के रूप में उभर रहा है। शहद के अलावा मधुमक्खियों से मोम, पराग (पोलन ग्रेन), रॉयल जेली, प्रोपोलिस और यहां तक कि मधुमक्खी के डंक से भी औषधीय उत्पाद तैयार किए जाते हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग है। खास बात यह है कि युवाओं में बढ़ते जिम कल्चर के बीच मधुमक्खियों से मिलने वाला पोलन ग्रेन एक प्राकृतिक प्रोटीन स्रोत के रूप में लोकप्रिय हो रहा है।पोलन ग्रेन मधुमक्खियों द्वारा फूलों से एकत्र किए गए पराग, फूलों के रस और उनकी लार के मिश्रण से बनता है। इसे मधुमक्खियां छत्ते में भोजन के रूप में संग्रहित करती हैं। यह प्रोटीन, विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है, जो न केवल मधुमक्खी कॉलोनी बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्राकृतिक सुपरफूड मांसपेशियों की रिकवरी और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक है।
छह जिलों में फैला मधुमक्खी पालन
एसएमएस एपिकल्चर नॉर्थ जोन कांगड़ा की विशेषज्ञ डॉ. निशा मेहरा ने बताया कि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा, चंबा, ऊना, हमीरपुर, कुल्लू और लाहौल जिलों में मधुमक्खी पालन किया जा रहा है। विभाग के अंतर्गत करीब 800 सरकारी मधुमक्खी बॉक्स स्थापित हैं। मधुमक्खी पालक सीजन के अनुसार शहद एकत्र कर चैतडू स्थित कलेक्शन सेंटर में भेजते हैं, जहां शहद को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस किया जाता है।
निजी स्तर पर मधुमक्खी पालन करने वाले पालक 8 रुपये प्रति किलो की दर से अपना शहद प्रोसेस करवा सकते हैं। प्रोसेस्ड शहद बाजार में लगभग 320 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिकता है, जबकि अनप्रोसेस्ड शहद की कीमत 200 से 250 रुपये प्रति किलो तक रहती है।
माइग्रेशन से बढ़ता उत्पादन
डॉ. निशा मेहरा ने बताया कि प्राकृतिक परिस्थितियों में जब किसी क्षेत्र में पर्याप्त फ्लोरा उपलब्ध नहीं होता, तब मधुमक्खियों को चीनी का घोल दिया जाता है और उन्हें फूलों वाले क्षेत्रों में स्थानांतरित किया जाता है। दिसंबर से फरवरी के दौरान पंजाब, हरियाणा, गुजरात और राजस्थान में सरसों की फसल प्रचुर मात्रा में होती है, ऐसे में मधुमक्खियों को वहां ले जाया जाता है।
मार्च-अप्रैल में हिमाचल में लीची का शहद, अप्रैल-मई में मल्टीफ्लोरा और जून-जुलाई में खैर का शहद प्राप्त किया जाता है। इससे न केवल मधुमक्खी पालकों को बेहतर शहद उत्पादन मिलता है, बल्कि संबंधित राज्यों में फसलों की परागण के जरिए पैदावार भी बढ़ती है।
800 मीट्रिक टन सालाना उत्पादन
प्रदेश में एक मधुमक्खी बॉक्स से औसतन 20 किलो शहद वार्षिक निकाला जाता है, जिसकी कीमत लगभग 3 हजार रुपये होती है। छह जिलों में करीब 2500 मधुमक्खी पालक सक्रिय हैं, जिनके पास लगभग 60 हजार मधुमक्खी वंश हैं। इनसे सालाना लगभग 800 मीट्रिक टन शहद का उत्पादन होता है। इसके अतिरिक्त मोम और पोलन जैसे उत्पाद भी निकलते हैं, जो अच्छे दामों पर बाजार में बिकते हैं।
सरकारी सब्सिडी और प्रशिक्षण
डॉ. निशा ने बताया कि मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। यदि कोई व्यक्ति अपनी शहद प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करना चाहता है, तो उसे 50 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है। मधुमक्खी पालन के लिए 5 से 7 दिन का प्रशिक्षण भी दिया जाता है, जिसमें देखरेख, बीमारियों से बचाव और शहद निष्कर्षण की पूरी जानकारी दी जाती है।
मुख्यमंत्री मधु विकास योजना के तहत यदि किसी मधुमक्खी पालक के पास 50 बॉक्स हैं, तो उसे 1.76 लाख रुपये तक की सब्सिडी मिलती है। साथ ही माइग्रेशन के लिए आने-जाने पर 5-5 हजार रुपये की सहायता भी प्रदान की जाती है।