नई दिल्ली। पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक के हवाले से संसद में छिड़ी तीखी बहस ने यह संकेत दिया है कि अब सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे भी राजनीतिक टकराव का केंद्र बनते जा रहे हैं। इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पुस्तक में किए गए दावों के आधार पर पूर्वी लद्दाख की कैलास रेंज में वर्ष 2020 के घटनाक्रम को उठाते हुए आरोप लगाया कि उस समय चीनी सेना की गतिविधियों के बीच शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व ने निर्णय लेने में देरी की और जिम्मेदारी सेना प्रमुख पर छोड़ दी। राहुल गांधी इसे राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरी के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
सरकार ने इन आरोपों को संसदीय मर्यादाओं के खिलाफ और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषय का राजनीतिकरण करार दिया है। सत्ता पक्ष का कहना है कि यदि हर सैन्य निर्णय को राजनीतिक बहस का विषय बनाया गया, तो इससे भविष्य में सेना और राजनीतिक नेतृत्व के बीच भरोसे की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
राहुल गांधी ने बुधवार को संसद में नरवणे की पुस्तक की प्रति हाथ में लेकर यह तर्क दिया कि सीमा पर किसी भी बड़ी सैन्य कार्रवाई का अंतिम फैसला केवल सैन्य नेतृत्व का नहीं, बल्कि सरकार और प्रधानमंत्री के स्तर पर होता है। पुस्तक में दावा किया गया है कि कैलास रेंज में चीनी सेना के चार टैंकों के साथ आगे बढ़ने की सूचना मिलने पर तत्कालीन सेना प्रमुख ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से दिशा-निर्देश मांगे थे।
कथित तौर पर जवाब में देरी होने पर सेना प्रमुख ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से भी संपर्क किया। बाद में रक्षा मंत्री से पुनः बातचीत में बताया गया कि प्रधानमंत्री से चर्चा के बाद शीर्ष नेतृत्व ने कहा था— “जो उचित समझो, करो।”
राहुल गांधी का आरोप है कि गंभीर संकट की घड़ी में राजनीतिक नेतृत्व ने दो घंटे से अधिक समय लिया और निर्णय लेने की जिम्मेदारी सेना प्रमुख पर छोड़ दी, जो नेतृत्व की विफलता को दर्शाता है। वहीं, सत्ता पक्ष इन दावों को आधारहीन बताते हुए कहता है कि सेना को राजनीतिक विवाद में घसीटने का यह प्रयास अनुचित है।
सरकार का तर्क है कि मोर्चे पर परिस्थितियों के अनुरूप रणनीतिक निर्णय लेना सेना का दायित्व होता है और यह प्रक्रिया सेना–सरकार के स्थापित संचालन तंत्र का हिस्सा है। प्रधानमंत्री की ओर से दिया गया “जो उचित समझो, करो” का निर्देश इसी व्यवस्था के तहत था, न कि नेतृत्व की कमजोरी का संकेत।
सत्ता पक्ष का यह भी कहना है कि यद्यपि सेना सरकार के अधीन होती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर सामरिक निर्णय राजनीतिक नेतृत्व ही ले। कई बार राजनीतिक नेतृत्व व्यापक नीति और दिशा तय करता है, जबकि तत्कालिक और जमीनी फैसले सेना के कमांडरों पर छोड़े जाते हैं।
इस पूरे विवाद के बीच विशेषज्ञों का मानना है कि सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर राजनीति करने के बजाय जिम्मेदार संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। सरकार पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य पेशेवर निर्णय और राजनीतिक जवाबदेही के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।