सिरसा। जीवनभर जिस शहर में लोग बसते हैं, उसी शहर में मृत्यु के बाद अंतिम विदाई के लिए दो गज जमीन न मिलना सिरसा के नाथ-सपेरा समाज के लिए बड़ी पीड़ा बन गया है। यहां समाज के लोगों को अंतिम संस्कार के लिए अपने परिजनों के शव को करीब 22 किलोमीटर दूर ले जाना पड़ता है, क्योंकि शहर में अब तक स्थायी समाधि स्थल की व्यवस्था नहीं हो पाई है।
गुरु तेग बहादुर नगर निवासी 50 वर्षीय कलीपड़ी बाई की बीमारी के चलते मृत्यु हो गई। परिजनों के लिए दुख की इस घड़ी में सबसे बड़ी समस्या अंतिम संस्कार की रही। शहर में समाधि स्थल न होने के कारण परिवार को शव को रानियां खंड के सुल्तानपुरिया-धोतड़ के पास ले जाकर दफनाना पड़ा। इससे एक दिन पहले भी इसी मोहल्ले के दो अन्य मृतकों को वहीं समाधि दी गई थी।
नाथ-सपेरा समाज में मृतक का अंतिम संस्कार अग्नि से नहीं, बल्कि भूमि में समाधि देकर करने की परंपरा है। लेकिन शहर में जगह न होने से यह परंपरा निभाना भी मुश्किल हो गया है। मृतका के देवर दिलबाग नाथ के अनुसार, पहले वाहन की व्यवस्था करनी पड़ती है, फिर रिश्तेदारों को साथ लेकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इससे शोक के साथ-साथ परिवार पर आर्थिक बोझ भी बढ़ जाता है।
सिरसा के पांच वार्डों और जिले के करीब 52 गांवों में बसे इस समाज के लोग कई बार प्रशासन और मुख्यमंत्री के समक्ष यह मांग उठा चुके हैं, लेकिन अब तक ठोस समाधान नहीं निकल पाया।
बताया गया है कि रानियां नगर पालिका ने समाधि स्थल के लिए करीब साढ़े तीन कनाल भूमि उपलब्ध करवाई है, लेकिन वहां चारदीवारी का कार्य अभी अधूरा है। ऐसे में नाथ-सपेरा समाज के लोगों को आज भी अपने ही शहर में अंतिम संस्कार का अधिकार नहीं मिल पा रहा है।