500 साल की विरासत और आस्था का अद्भुत संगम: क्यों खास है मंडी की अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि
मंडी, धर्मवीर-:हिमाचल प्रदेश का ऐतिहासिक नगर मंडी, जिसे छोटी काशी के नाम से भी जाना जाता है, अपनी स्थापना के 499 वर्ष पूरे कर 500वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। इस ऐतिहासिक पड़ाव को खास बनाने के लिए इस बार की अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि और भी भव्य रूप में आयोजित की जा रही है।
सदियों पुरानी परंपराओं, देव संस्कृति और राजसी विरासत का अनूठा संगम यहां देखने को मिलता है।
1527 में हुई थी स्थापना, तभी से शुरू हुई परंपरा
इतिहास के अनुसार 1527 ईस्वी में राजा अजबर सेन ने मंडी नगर की स्थापना की थी। नगर बसाने के साथ ही उन्होंने शिवरात्रि के अवसर पर रियासत के सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित कर एक भव्य उत्सव मनाने की परंपरा शुरू की। यही परंपरा आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव के रूप में विकसित हुई।मंडी अपने प्राचीन मंदिरों और समृद्ध देव संस्कृति के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहां सैकड़ों छोटे-बड़े मंदिर हैं, जिनके कारण इसे छोटी काशी की उपाधि मिली। हर वर्ष शिवरात्रि पर पूरा नगर देवमय हो उठता है।
शैव, वैष्णव और लोक देवताओं का अनूठा मिलन
मंडी की शिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था का विराट उत्सव है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां शैव, वैष्णव और लोक देवताओं का अद्भुत संगम होता है।
शैव परंपरा के प्रतीक हैं भगवान शिव
वैष्णव परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं भगवान कृष्ण
लोक देवताओं में प्रमुख हैं जनपद के आराध्य देव कमरूनाग शिवरात्रि से एक दिन पूर्व ही आसपास के क्षेत्रों से देवी-देवताओं का आगमन शुरू हो जाता है। शिवरात्रि के अगले दिन से सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय महोत्सव की औपचारिक शुरुआत होती है। इसकी शुरुआत पारंपरिक ‘जलेब’ यानी भव्य शोभायात्रा से होती है, जिसमें देवरथों के साथ श्रद्धालु नाचते-गाते चलते हैं। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर झूमते देव रथों का दृश्य अत्यंत भावुक और आकर्षक होता है।
राज माधव राय की अगुवाई में शुरू होता है महोत्सव
मंडी की शिवरात्रि का राज परिवार से गहरा संबंध रहा है। यहां की मान्यता है कि जब तक राज देवता माधव राय की पालकी नहीं निकलती, तब तक शिवरात्रि महोत्सव की शोभायात्रा शुरू नहीं होती।राज माधव राय को भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। 18वीं शताब्दी में राजा सूरज सेन के 18 पुत्रों का असामयिक निधन हो गया था। इस दुखद घटना के बाद राजा ने अपना संपूर्ण राजपाठ माधव राय को समर्पित कर स्वयं को उनका सेवक घोषित कर दिया। तभी से मंडी में शिवरात्रि महोत्सव राज माधव राय की अगुवाई में मनाया जाता है।महोत्सव में भाग लेने वाले सभी देवी-देवता सबसे पहले माधव राय मंदिर में हाजिरी भरते हैं, जिसके बाद अन्य धार्मिक कार्यक्रम शुरू होते हैं।
500 वर्षों की स्वर्णिम यात्रा की झलक
इस वर्ष मंडी अपने स्वर्णिम 500वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। प्रशासन द्वारा महोत्सव में नगर के 500 वर्षों के इतिहास, सांस्कृतिक विकास और परंपराओं की झलक प्रस्तुत करने का विशेष प्रयास किया जा रहा है। प्रदर्शनी, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और विशेष आयोजनों के माध्यम से शहर की ऐतिहासिक यात्रा को दर्शाया जाएगा।
जिला प्रशासन की ओर से पूरे आयोजन की व्यवस्था की जाती है। पारंपरिक रीति-रिवाजों के निर्वहन के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों और व्यापारिक मेले का भी आयोजन किया जाता है। समय के साथ महोत्सव में कई बदलाव आए हैं, लेकिन इसकी मूल परंपरा आज भी अक्षुण्ण है।
16 से 22 फरवरी तक सात दिवसीय उत्सव
शिवरात्रि का आधिकारिक महोत्सव हमेशा शिवरात्रि के अगले दिन से आरंभ होता है। इस वर्ष यह आयोजन 16 से 22 फरवरी तक मनाया जा रहा है।
16 फरवरी: पहली पारंपरिक जलेब
19 फरवरी: मध्य जलेब
22 फरवरी: अंतिम जलेब और विधिवत समापन
परंपरा के अनुसार आजादी के बाद से प्रदेश के मुख्यमंत्री इस महोत्सव का उद्घाटन करते रहे हैं, लेकिन इस बार उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री शुभारंभ करेंगे। समापन अवसर पर राज्यपाल की उपस्थिति में अंतिम जलेब निकाली जाएगी।
महोत्सव के दौरान छह सांस्कृतिक संध्याओं का आयोजन भी किया जाएगा, जिनमें इस बार विशेष रूप से हिमाचली कलाकारों को मंच दिया जाएगा।
आस्था, संस्कृति और इतिहास का जीवंत उत्सव
मंडी की अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पांच शताब्दियों की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। यहां देव परंपराएं, राजसी इतिहास, लोक आस्था और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्थाएं एक साथ दिखाई देती हैं। यही कारण है कि यह महोत्सव राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है।500 वर्षों की इस ऐतिहासिक यात्रा के साथ मंडी नगर एक बार फिर यह साबित कर रहा है कि आस्था और संस्कृति की जड़ें जितनी गहरी होती हैं, परंपराएं उतनी ही मजबूत और जीवंत बनी रहती हैं।