पंचकूला । सड़क दुर्घटना में 23 वर्षीय युवक संदीप की मौत के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने आश्रित परिवार को बड़ी राहत प्रदान की है। अदालत ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, सोनीपत द्वारा वर्ष 2019 में दिए गए मुआवजा आदेश में संशोधन करते हुए क्षतिपूर्ति राशि में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
हाई कोर्ट की एकलपीठ ने पहले निर्धारित 21.11 लाख रुपये के मुआवजे को बढ़ाकर 35.18 लाख रुपये कर दिया है। इस फैसले के साथ परिवार को 14.07 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि मिलेगी। साथ ही दावा याचिका दायर करने की तिथि से भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा।
अपीलकर्ता सुमन शर्मा और अन्य आश्रितों ने अदालत में दलील दी थी कि अधिकरण ने मृतक की वास्तविक आय का सही आकलन नहीं किया। रिकॉर्ड के अनुसार संदीप एक निजी कंपनी में कार्यरत था और जुलाई 2017 की वेतन पर्ची में उसकी मासिक आय 14,412 रुपये दर्शाई गई थी। इसके बावजूद अधिकरण ने उसकी आय 9,000 रुपये प्रतिमाह मानकर मुआवजा तय किया था।
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत दावे की कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है और तकनीकी आधार पर प्रमाणित वेतन पर्ची को खारिज करना उचित नहीं था। अदालत ने मृतक की मासिक आय 14,500 रुपये स्वीकार करते हुए मुआवजे की पुनर्गणना की।
सुप्रीम कोर्ट के निर्धारित सिद्धांतों का हवाला देते हुए अदालत ने 23 वर्ष की आयु के अनुसार 18 का मल्टीप्लायर लागू किया और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए आय में 40 प्रतिशत की वृद्धि जोड़ी। पुनर्गणना के अनुसार मासिक निर्भरता 15,225 रुपये निर्धारित हुई, जिससे वार्षिक निर्भरता 32,88,600 रुपये आंकी गई।
इसके अतिरिक्त 15,000 रुपये संपत्ति हानि, 15,000 रुपये अंतिम संस्कार व्यय तथा 2 लाख रुपये पारिवारिक, दांपत्य और संतान संबंधी मद में प्रदान किए गए। इस प्रकार कुल मुआवजा 35,18,600 रुपये तय किया गया।
अदालत ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया है कि वह दो माह के भीतर बढ़ी हुई राशि 9 प्रतिशत ब्याज सहित अधिकरण में जमा कराए। अधिकरण को आदेश दिया गया है कि पूर्व निर्धारित अनुपात के अनुसार राशि सीधे आश्रितों के बैंक खातों में हस्तांतरित की जाए।
अपने फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य दुर्घटना पीड़ित परिवारों को न्यायसंगत और मानवीय आधार पर राहत प्रदान करना है। न्यायालय ने कहा कि मुआवजे का निर्धारण यांत्रिक तरीके से नहीं, बल्कि संवेदनशील और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए, ताकि पीड़ित परिवार को वास्तविक न्याय मिल सके।