दुनिया भर में वन्यजीव संरक्षण के लिए काम करने वाले कई गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) की एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि फेसबुक अवैध वन्यजीव तस्करी का दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञात ऑनलाइन बाजार बन चुका है। रिपोर्ट के अनुसार, मेटा के स्वामित्व वाले फेसबुक पर वन्यजीवों और उनसे जुड़े उत्पादों की खरीद-फरोख्त से संबंधित बड़ी संख्या में विज्ञापन और पोस्ट खुलेआम उपलब्ध हैं। संरक्षण संगठनों का कहना है कि प्लेटफॉर्म की कमजोर कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था और कंटेंट से कमाई (मॉनेटाइजेशन) की सुविधाएं इस अवैध कारोबार को बढ़ावा दे रही हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि दो वर्षों तक किए गए अध्ययन के दौरान लगभग 20,000 ऑनलाइन विज्ञापनों में करीब 2.6 लाख वन्यजीवों या उनसे जुड़े उत्पादों की बिक्री के संकेत मिले। विश्लेषण में पाया गया कि दर्ज किए गए अधिकांश विज्ञापन फेसबुक पर ही मौजूद थे। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह केवल कुछ अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक संगठित ऑनलाइन नेटवर्क का हिस्सा हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, तस्कर फेसबुक ग्रुप, पेज, मैसेंजर और सिफारिश (रिकमेंडेशन) एल्गोरिद्म का उपयोग संभावित खरीदारों तक पहुंचने के लिए कर रहे हैं। कई मामलों में उपयोगकर्ताओं को “सजेस्टेड ग्रुप” और संबंधित कंटेंट के माध्यम से ऐसे नेटवर्क तक पहुंचने में आसानी होती है। संरक्षण विशेषज्ञों का कहना है कि इससे अवैध कारोबार का दायरा और तेजी से बढ़ता है।
{जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा – रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ऑनलाइन बिक्री के लिए पेश किए गए लगभग 84 प्रतिशत जीव या वन्यजीव उत्पाद ऐसे थे, जिनका अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक व्यापार वन्यजीव व्यापार संधि के तहत प्रतिबंधित या कड़े नियंत्रण में है। इनमें पैंगोलिन, समुद्री कछुए, हॉर्नबिल, दुर्लभ बंदर, सांप और अन्य संकटग्रस्त प्रजातियां शामिल थीं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह का व्यापार जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा है और इससे कई प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट गहरा सकता है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े संगठनों ने मेटा से मांग की है कि वह केवल नीतियां बनाने तक सीमित न रहे, बल्कि संदिग्ध समूहों और खातों की पहचान कर उन्हें तेजी से हटाए। साथ ही, ऐसे कंटेंट पर कमाई की सुविधा समाप्त करने, एल्गोरिद्म की निगरानी बढ़ाने और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने की भी सिफारिश की गई है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निगरानी प्रभावी नहीं
मेटा का कहना है कि उसकी नीतियां फेसबुक और इंस्टाग्राम पर जीवित वन्यजीवों तथा उनसे जुड़े अवैध उत्पादों की बिक्री की अनुमति नहीं देतीं। कंपनी का दावा है कि वह वर्षों से वन्यजीव संरक्षण संगठनों के साथ मिलकर संदिग्ध कंटेंट हटाने और ऐसे नेटवर्क पर कार्रवाई करने का काम कर रही है।
मेटा का यह भी कहना है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले खातों और समूहों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आज वैश्विक व्यापार का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। ऐसे में यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निगरानी प्रभावी नहीं होगी तो अवैध वन्यजीव तस्करी पर अंकुश लगाना मुश्किल होगा। उनका कहना है कि सरकारों, सोशल मीडिया कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संगठनों के बीच समन्वित प्रयास ही इस संगठित अपराध पर प्रभावी रोक लगा सकते हैं।