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पंजाब में अब नशे पर नकेल कसने की बड़ी तैयारी

अर्शदीप सिंह समर। चंडीगढ़
समर न्यूज

पंजाब सरकार ने नशे पर नकेल कसने के लिए बड़ी तैयारी कर ली है। सरकार ने नशे के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को स्कूलों तक पहुंचाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। राज्य में 21,850 से अधिक शिक्षकों को छात्रों में नशे के इस्तेमाल और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों के शुरुआती संकेत पहचानने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।
‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान के तहत शुरू किए गए इस कार्यक्रम का मकसद केवल नशे की पहचान करना नहीं, बल्कि किसी बच्चे में जोखिम के संकेत दिखाई देने पर उसे समय रहते समझना, संवेदनशील तरीके से बात करना और जरूरत पड़ने पर उचित सहायता तक पहुंचाना है।
सरकार का मानना है कि शिक्षक बच्चों के साथ नियमित संपर्क में रहते हैं, इसलिए वे नशे की ओर बढ़ रहे किसी विद्यार्थी में बदलाव को सबसे पहले पहचान सकते हैं। प्रशिक्षण की शुरुआत पिछले सप्ताह फाजिल्का व तरनतारन से हुई, जहां 800 से अधिक शिक्षकों ने कार्यशालाओं में हिस्सा लिया।
अब इसे फिरोजपुर, गुरदासपुर, पठानकोट, श्री मुक्तसर साहिब, फरीदकोट, मोहाली, रूपनगर, कपूरथला, लुधियाना और पटियाला तक ले जाने की तैयारी है। कुल 12 जिलों में यह प्रशिक्षण चरणबद्ध तरीके से 500 से अधिक बैचों में आयोजित किया जा रहा है। एक दिवसीय प्रशिक्षण में नशे के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं के साथ-साथ छात्रों के व्यवहार में आने वाले बदलावों को समझने पर जोर दिया जा रहा है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. बलबीर सिंह के अनुसार प्रशिक्षण का उद्देश्य शिक्षकों को ऐसे छात्रों की पहचान करने में सक्षम बनाना है, जो नशे या मानसिक तनाव के कारण जोखिम में हो सकते हैं। सरकार का जोर इस बात पर है कि शिक्षक ऐसे मामलों में बच्चे को अपराधी या अनुशासनहीन मानने के बजाय संवेदनशीलता से उसकी स्थिति समझें। जरूरत पड़ने पर छात्र को परामर्श, स्वास्थ्य सेवाओं या नशामुक्ति एवं पुनर्वास की सुविधाओं से जोड़ा जा सकेगा।
इस पहल में शिक्षकों की भूमिका केवल प्रशिक्षण लेने तक सीमित नहीं रहेगी। प्रशिक्षण के बाद उन्हें स्कूलों में गतिविधियां करने और छात्रों के व्यवहार पर नजर रखने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाएगा। कार्यक्रम में शिक्षक नशे के खिलाफ अपनी भूमिका निभाने की शपथ लेंगे। इसका उद्देश्य स्कूल को ऐसा सुरक्षित वातावरण बनाना है, जहां विद्यार्थी अपनी परेशानी खुलकर बता सकें।

प्रशिक्षण की निगरानी भी होगी
कार्यक्रम को राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद यानी एससीईआरटी की ओर से सामाजिक सुरक्षा एवं महिला एवं बाल विकास विभाग के समन्वय से लागू किया जा रहा है। डेटा इंटेलिजेंस एंड टेक्निकल सपोर्ट यूनिट प्रशिक्षण सामग्री तैयार करने, कार्यक्रम को लागू करने और उसकी गुणवत्ता पर नजर रखने में सहयोग कर रही है। जिलों में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की गई है, ताकि उच्च और वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। यह कार्यक्रम नशामुक्त भारत अभियान और नशे की मांग कम करने के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना के साथ भी जोड़ा गया है। सरकार की रणनीति में स्कूलों को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि किशोरावस्था में साथियों का दबाव, मानसिक तनाव, पारिवारिक परिस्थितियां और नशे को लेकर गलत धारणाएं बच्चों को जोखिम में डाल सकती हैं। ऐसे में केवल पुलिस कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं माना जा रहा। सरकार अब रोकथाम, जागरूकता, शुरुआती पहचान, उपचार और पुनर्वास को एक-दूसरे से जोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है।
पाठ्यक्रम के जरिए भी रोकथाम
पंजाब ने स्कूल स्तर पर नशे की रोकथाम के लिए पहले ही विशेष पाठ्यक्रम लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसके तहत कक्षा नौवीं से 12वीं तक के करीब आठ लाख विद्यार्थियों को शामिल किया गया था। कार्यक्रम के लिए 3,658 स्कूलों और 6,500 से अधिक प्रशिक्षित शिक्षकों को जोड़ा गया। इसमें बच्चों को केवल नशे के नुकसान गिनाने के बजाय संवाद, गतिविधियों, क्विज, पोस्टर, समूह कार्य और वास्तविक जीवन की परिस्थितियों के माध्यम से नशे से दूर रहने तथा साथियों के दबाव से निपटने के तरीके समझाने पर जोर है। इस कार्यक्रम की अवधि 27 सप्ताह रखी गई थी और प्रत्येक दो सप्ताह में 35 मिनट का संवादात्मक सत्र आयोजित करने की व्यवस्था की गई। इसका मकसद बच्चों को डराने के बजाय उन्हें सही निर्णय लेने की क्षमता देना था। अमृतसर और तरनतारन के 78 सरकारी स्कूलों में करीब 9,600 विद्यार्थियों के साथ किए गए परीक्षण में कार्यक्रम के बाद नशे से जुड़े कुछ गलत विश्वासों में कमी दर्ज की गई थी। इससे सरकार को स्कूल आधारित रोकथाम की रणनीति को आगे बढ़ाने का आधार मिला।
पुलिस कार्रवाई के साथ इलाज पर भी जोर
पंजाब सरकार की मौजूदा रणनीति का दूसरा हिस्सा नशे की आपूर्ति करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और नशे की गिरफ्त में आ चुके लोगों के उपचार पर केंद्रित है। मार्च 2025 से छह जुलाई 2026 तक पंजाब पुलिस ने एनडीपीएस कानून के तहत 51,516 मामले दर्ज किए और 67,519 लोगों को गिरफ्तार किया। इसी अवधि में 10,656 ऐसे लोगों ने उपचार का विकल्प चुना, जिन पर नशीले पदार्थों के सेवन या निजी उपयोग के लिए कम मात्रा रखने से संबंधित आरोप थे। उन्हें एनडीपीएस अधिनियम की धारा 64-ए के तहत अभियोजन से राहत देकर सरकारी नशामुक्ति एवं पुनर्वास केंद्रों में उपचार के लिए भेजा गया।
नशे की आपूर्ति करने वाले नेटवर्क पर नजर
सरकार की यह नीति इस सोच पर आधारित है कि नशा करने वाले व्यक्ति और नशे की आपूर्ति करने वाले नेटवर्क को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। तस्करों और सप्लायरों के खिलाफ कानून के तहत सख्ती जरूरी है, जबकि नशे की लत से जूझ रहे व्यक्ति के लिए इलाज और पुनर्वास की जरूरत है। इसी वजह से अभियान में पुलिस कार्रवाई के साथ स्वास्थ्य सेवाओं और पुनर्वास को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। अमृतसर में इस साल जनवरी से जुलाई के दौरान पुलिस ने 1,137 एनडीपीएस मामले दर्ज कर 1,898 आरोपियों को गिरफ्तार किया। इस अवधि में 111.559 किलोग्राम हेरोइन, 11.438 किलोग्राम मेथामफेटामाइन, 9.2 किलोग्राम अफीम, 2.2 किलोग्राम चरस और बड़ी संख्या में नशीली गोलियां व कैप्सूल बरामद किए गए। यह आंकड़ा बताता है कि सीमा से लगे जिलों में नशे की आपूर्ति रोकना अभी भी बड़ी चुनौती है।
42.95 करोड़ रुपये की कार्ययोजना
नशे के खिलाफ अभियान को और व्यापक बनाने के लिए पंजाब सरकार ने 2026-27 के लिए 42.95 करोड़ रुपये की कार्ययोजना प्रस्तावित की है। राष्ट्रीय स्तर की नशे की मांग कम करने संबंधी कार्ययोजना के तहत प्रस्तावित इस राशि में रोकथाम, जागरूकता, जीवन कौशल शिक्षा, परामर्श, नशामुक्ति और पुनर्वास कार्यक्रम शामिल हैं। सरकार की योजना स्कूलों, कॉलेजों और समुदाय स्तर पर जागरूकता गतिविधियों को बढ़ाने के साथ खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों और युवाओं की सकारात्मक भागीदारी को भी बढ़ावा देने की है। इसका अर्थ यह है कि सरकार अब नशे की समस्या को केवल कानून-व्यवस्था के मुद्दे के रूप में नहीं देख रही। युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए शिक्षा, खेल, रोजगार, मानसिक स्वास्थ्य, परिवार और समुदाय को भी अभियान का हिस्सा बनाने की कोशिश की जा रही है। शिक्षकों की ट्रेनिंग इसी व्यापक रणनीति की कड़ी है।
सूचना देने के लिए हेल्पलाइन
नशे की बिक्री और सेवन से जुड़ी जानकारी हासिल करने के लिए राज्य में ‘सेफ पंजाब’ एंटी-ड्रग व्हाट्सऐप हेल्पलाइन भी संचालित है। सरकारी दस्तावेज के अनुसार 97791-00200 नंबर पर नशे की बिक्री या सेवन से संबंधित सूचना ली जाती है। प्राप्त जानकारी की जांच के बाद विश्वसनीय सूचना को संबंधित क्षेत्र की टीम तक भेजने की व्यवस्था है। इससे आम लोगों को सीधे पुलिस थाने पहुंचे बिना सूचना देने का विकल्प मिलता है। सरकार ने अभियान में समुदाय की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया है। गांवों, मोहल्लों, पंचायतों, स्कूलों और अन्य संस्थानों को नशे के खिलाफ जागरूकता गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। इसका उद्देश्य यह संदेश देना है कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस या स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परिवार, शिक्षक और समाज की भी साझा जिम्मेदारी है।

गंभीर मरीजों के लिए
मेथाडोन मेंटेनेंस थेरेपी
उपचार के मोर्चे पर भी राज्य ने नई व्यवस्था शुरू की है। गंभीर ओपिओइड निर्भरता वाले मरीजों के लिए मेथाडोन मेंटेनेंस थेरेपी शुरू की गई है। छह समर्पित मेथाडोन क्लीनिक फरीदकोट, लुधियाना, पटियाला, गुरदासपुर, मोहाली और जालंधर में संचालित किए जा रहे हैं और छह अन्य केंद्र शुरू करने की योजना बताई गई है। इससे उन मरीजों को उपचार का एक अतिरिक्त विकल्प मिलने की उम्मीद है, जिन्हें लंबे समय से नशे की निर्भरता से बाहर निकालने के लिए निरंतर चिकित्सकीय सहायता की जरूरत होती है। इससे पहले राज्य में 500 से अधिक ओओएटी केंद्रों के जरिए ओपिओइड निर्भरता से जूझ रहे लोगों को उपचार उपलब्ध कराया जा रहा था। अब सरकार उपचार व्यवस्था में विविधता लाने के साथ पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापना पर भी जोर दे रही है।
सीमा पार तस्करी बड़ी चुनौती
पंजाब की नशे के खिलाफ लड़ाई में सीमा पार से होने वाली तस्करी सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल है। ड्रोन के जरिये नशीले पदार्थों की तस्करी के मामलों ने पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौती खड़ी की है। ऐसे में स्कूलों में जागरूकता और शुरुआती पहचान की कोशिशों के साथ सीमा क्षेत्रों में निगरानी तथा तस्करी नेटवर्क पर कार्रवाई को भी तेज करना जरूरी है। हाल के मामलों में भी सीमा से लगे फाजिल्का क्षेत्र में बड़ी मात्रा में हेरोइन बरामद हुई है। इससे साफ है कि आपूर्ति रोकने की कार्रवाई के साथ मांग कम करने पर ध्यान देना होगा। केवल तस्करों की गिरफ्तारी से समस्या खत्म नहीं होगी, क्योंकि जब तक नशे की मांग बनी रहेगी, तब तक आपूर्ति के नए रास्ते तलाशने का खतरा रहेगा।
असली परीक्षा स्कूलों में होगी
21,850 शिक्षकों को प्रशिक्षण देने की योजना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका असर सीधे विद्यार्थियों तक पहुंचना है। यदि शिक्षक नशे के शुरुआती संकेतों को पहचान पाते हैं, छात्र से भरोसे का रिश्ता बनाकर बात कर पाते हैं और जरूरत पड़ने पर उसे विशेषज्ञ सहायता तक पहुंचा पाते हैं तो कई मामलों में समस्या गंभीर होने से पहले हस्तक्षेप संभव हो सकता है। हालांकि इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशिक्षण के बाद शिक्षकों को लगातार विशेषज्ञ सहयोग, परामर्श सेवाएं और स्पष्ट दिशा-निर्देश मिलते हैं या नहीं।
रणनीति व नतीजों फोकस
पंजाब सरकार का मौजूदा मॉडल अब तीन स्तरों पर आगे बढ़ता दिख रहा है—स्कूलों और समुदायों में रोकथाम, नशे की आपूर्ति करने वालों पर कानूनी कार्रवाई तथा प्रभावित लोगों के लिए उपचार और पुनर्वास। 42.95 करोड़ रुपये की प्रस्तावित कार्ययोजना, शिक्षक प्रशिक्षण, विशेष पाठ्यक्रम, हेल्पलाइन और उपचार सुविधाओं का विस्तार इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इन पहलों को कागज और प्रशिक्षण कक्षों से निकालकर जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करने की है। 21,850 शिक्षकों की क्षमता का इस्तेमाल तभी सार्थक होगा, जब स्कूलों में जोखिम वाले विद्यार्थियों की पहचान के बाद उन्हें समय पर परामर्श और उपचार मिले, परिवारों को साथ लिया जाए और नशे की आपूर्ति करने वाले नेटवर्क पर कार्रवाई लगातार जारी रहे। अभियान की सफलता गिरफ्तारियों और बरामदगी के आंकड़ों के साथ-साथ इस बात से भी मापी जाएगी कि कितने युवा नशे की ओर जाने से बचे और कितने प्रभावित लोग सफलतापूर्वक सामान्य जीवन में लौट सके।

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