समर न्यूज | चंडीगढ़
पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से चल रही गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर खींचतान के बीच पार्टी नेतृत्व अब सभी प्रमुख नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश में जुट गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के अगले महीने पंजाब दौरे की तैयारी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। प्रस्तावित दौरे में पार्टी कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद के साथ संगठन को चुनाव के लिए तैयार करने और अलग-अलग खेमों में बंटे नेताओं के बीच दूरी कम करने पर जोर रहने की संभावना है।
सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी पंजाब में एक व्यापक यात्रा के जरिये कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं से संपर्क करेंगे। इसे पार्टी के भीतर एकजुटता का संदेश देने के साथ 2027 के विधानसभा चुनाव की जमीन तैयार करने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। यात्रा का स्वरूप और कार्यक्रम अभी अंतिम रूप से घोषित नहीं हुआ है, लेकिन पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन के भीतर जारी मतभेदों को चुनावी तैयारी में बाधा बनने से रोकना है।
पंजाब कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री और जालंधर से सांसद चरणजीत सिंह चन्नी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के बीच मतभेद पिछले कुछ महीनों में खुलकर सामने आए हैं। चन्नी समर्थक प्रदेश नेतृत्व में बदलाव और उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाए जाने की मांग उठाते रहे हैं। दूसरी ओर, पार्टी हाईकमान ने वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद पर बनाए रखा है। पंजाब कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल ने हाल में स्पष्ट किया था कि प्रदेश नेतृत्व में तत्काल बदलाव नहीं होगा और संगठन के विस्तार पर ध्यान दिया जाएगा।
गुटबाजी का असर पार्टी के कार्यक्रमों में भी दिखाई दिया है। बठिंडा में कांग्रेस के कार्यक्रम के दौरान कुछ कार्यकर्ताओं ने चन्नी के समर्थन में नारे लगाए और एक वर्ग ने कार्यक्रम का बहिष्कार भी किया। कई अन्य स्थानों पर भी चन्नी समर्थकों और वड़िंग खेमे के बीच दूरी सामने आई। इसके विपरीत लुधियाना में पार्टी ने सभी प्रमुख नेताओं को कार्यक्रमों में आमंत्रित कर अपेक्षाकृत एकजुट चेहरा पेश करने की कोशिश की। इस बीच 15 अगस्त को इसरू में चन्नी और वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा के एक मंच पर आने से भी पार्टी के भीतर नए समीकरणों की चर्चा तेज हुई। वहां चन्नी के समर्थन में नारे भी लगे, जबकि वड़िंग कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे। इससे यह संकेत मिला कि मतभेद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
हाईकमान का संतुलन
कांग्रेस नेतृत्व के लिए पंजाब में चुनौती केवल दो नेताओं के बीच संतुलन बनाने तक सीमित नहीं है। प्रताप सिंह बाजवा, सुखजिंदर सिंह रंधावा, भारत भूषण आशु, विजय इंदर सिंगला और अन्य वरिष्ठ नेताओं की अपनी-अपनी राजनीतिक पकड़ और महत्व है। जून में राहुल गांधी ने पंजाब के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ चर्चा की थी। इससे संकेत मिला था कि हाईकमान राज्य में किसी एक खेमे के बजाय व्यापक संतुलन कायम करने की कोशिश कर रहा है। चन्नी का महत्व कांग्रेस के लिए सामाजिक और चुनावी दोनों दृष्टि से है। वह पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री रहे हैं और अनुसूचित जाति समुदाय में उनका प्रभाव माना जाता है। ऐसे में उन्हें नजरअंदाज करना कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है। दूसरी ओर, वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने का फैसला भी हाईकमान के लिए आसान नहीं है, क्योंकि इससे संगठनात्मक स्थिरता और नेतृत्व संबंधी फैसलों पर सवाल उठ सकते हैं।
चन्नी की परीक्षा, सियासत भी
चन्नी का हालिया रुख भी हाईकमान की रणनीति के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व के साथ बातचीत के बाद कहा था कि वह हाईकमान के फैसले का पालन करेंगे। हालांकि, इसके बाद भी उनके समर्थकों की गतिविधियां और अलग-अलग कार्यक्रमों में उनकी सक्रियता जारी रही। 20 अगस्त को वह कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में शामिल नहीं हुए क्योंकि पंजाब विश्वविद्यालय में उनकी परीक्षा थी। उन्होंने कहा कि पार्टी हाईकमान को उनकी परीक्षा के बारे में जानकारी थी।
चुनाव से पहले एकजुटता जरूरी
कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि राहुल गांधी का प्रस्तावित पंजाब दौरा क्या वास्तव में सभी धड़ों को एक मंच पर ला पाएगा। पार्टी के लिए 2027 का विधानसभा चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है। 2022 में कांग्रेस केवल 18 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसने राज्य की 13 में से सात सीटें जीती थीं। इससे पार्टी को वापसी की उम्मीद मिली, लेकिन मौजूदा गुटबाजी उस लाभ को विधानसभा चुनाव में बदलने की राह में बड़ी चुनौती है।
विरोधियों को मौका न देने की कोशिश
कांग्रेस हाईकमान यह भी नहीं चाहेगा कि आंतरिक मतभेदों का लाभ आम आदमी पार्टी, भाजपा या शिरोमणि अकाली दल को मिले। पार्टी में टूट या नेताओं के दूसरे दलों की ओर जाने की आशंका के कारण भी हाईकमान ने फिलहाल कठोर कार्रवाई से परहेज किया है। अब राहुल गांधी के पंजाब दौरे को इसी व्यापक रणनीति के तहत देखा जा रहा है- सभी नेताओं को साथ रखना, संगठन को सक्रिय करना और चुनाव से पहले कांग्रेस को एकजुट राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश करना।