समर न्यूज | जालंधर
पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच राजनीतिक दलों की नजर अब केवल पारंपरिक वोट बैंक और संगठन पर नहीं, बल्कि धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के प्रभाव पर भी है।
राज्य में डेरों की मजबूत सामाजिक मौजूदगी को देखते हुए सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल समेत प्रमुख दल धार्मिक स्थलों और डेरा प्रमुखों से संपर्क बढ़ा रहे हैं। हालांकि, मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में केवल किसी डेरे का समर्थन चुनावी जीत की गारंटी नहीं माना जा सकता। पंजाब की करीब 32 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति से संबंधित है और कई डेरों की इन समुदायों के बीच गहरी सामाजिक पहुंच है। यही वजह है कि चुनावी रणनीति में डेरों का महत्व बढ़ जाता है।
विशेष रूप से मालवा में डेरा सच्चा सौदा, दोआबा में डेरा सचखंड बल्लां और माझा में राधा स्वामी सत्संग ब्यास का प्रभाव राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि इन संस्थाओं की ओर से सार्वजनिक रूप से राजनीतिक दलों का समर्थन करने की स्थिति हमेशा स्पष्ट नहीं रहती। पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में 69 मालवा क्षेत्र में हैं। यहां डेरा सच्चा सौदा समेत कई धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं का अनुयायी आधार माना जाता है। दोआबा में डेरा सचखंड बल्लां का प्रभाव खास तौर पर रविदासिया समुदाय में है। वहीं माझा में सिख धार्मिक संस्थाओं और पंथक मुद्दों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण
रहती है। इस क्षेत्रीय अंतर के कारण कोई एक धार्मिक संस्था पूरे पंजाब में एक जैसा राजनीतिक प्रभाव नहीं डालती।
हाल के महीनों में राजनीतिक नेताओं की डेरा यात्राओं ने इस चर्चा को और तेज किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डेरा सचखंड बल्लां में संत निरंजन दास से मुलाकात की थी। इसके बाद मुख्यमंत्री भगवंत मान ने डेरा लाल बादशाह जाने का कार्यक्रम बनाया। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी भी डेरा ब्यास प्रमुख बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों से मिल चुके हैं। कांग्रेस नेता भी समय-समय पर प्रमुख डेरों में
जाते रहे हैं।
{सभी दल साध रहे संतुलन…
भाजपा पंजाब में अपने सीमित पारंपरिक आधार का विस्तार करने के लिए दलित मतदाताओं तक पहुंच बढ़ा रही है। डेरा सचखंड बल्लां के साथ संपर्क को इसी व्यापक सामाजिक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। आम आदमी पार्टी भी पंथक मुद्दों के साथ-साथ विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने में जुटी है। अकाली दल के लिए धार्मिक राजनीति का महत्व और अधिक है, क्योंकि वह अपनी पारंपरिक पंथक जमीन वापस हासिल करने की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस फिलहाल डेरों को लेकर अपेक्षाकृत सतर्क दिखाई देती है। इसके बावजूद पार्टी के नेता धार्मिक संस्थाओं के कार्यक्रमों में भाग लेते रहे हैं। चुनाव नजदीक आने के साथ यह संपर्क और बढ़ सकता है।
{बदला है मतदाताओं का रुख
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2017 और 2022 के चुनावों के अनुभव से यह संकेत मिलता है कि मतदाता धार्मिक प्रभाव से पूरी तरह निर्देशित नहीं होता। बेरोजगारी, नशा, कृषि, कानून-व्यवस्था, बेअदबी, विकास और शासन जैसे मुद्दे कई बार पारंपरिक वोट समीकरण बदल देते हैं। इसलिए राजनीतिक दल डेरा प्रभाव को महत्वपूर्ण मानते हुए भी केवल उस पर निर्भर रहने का जोखिम नहीं उठा सकते।
{आस्था के साथ मुद्दों की परीक्षा
2027 में चुनावी मुकाबला बहुकोणीय रहने की संभावना है। आम आदमी पार्टी के सामने सत्ता बचाने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस, भाजपा और अकाली दल अपने-अपने आधार को मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में डेरों और धार्मिक संस्थाओं तक पहुंच किसी दल को अतिरिक्त सामाजिक बढ़त दे सकती है, लेकिन अंतिम फैसला स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय मुद्दे, सरकार के कामकाज और मतदाताओं की स्वतंत्र पसंद पर निर्भर करेगा। इसीलिए इस बार पंजाब की चुनावी तस्वीर में आस्था महत्वपूर्ण कारक तो होगी, लेकिन सत्ता की अकेली चाबी नहीं।