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पत्रकारिता में सबसे कठिन दौर वर्ष 1989 का था जब वेतन बोर्ड के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी

पायल मोहिंद्रा। चंडीगढ़
समर न्यूज

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अश्विनी भटनागर ने पत्रकारिता के अपने लंबे सफर में कई महत्वपूर्ण दौर देखे हैं। उनके करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण वर्ष 1989 रहा, जब उन्होंने पत्रकारों के वेतन से जुड़े बछावत वेतन बोर्ड की सिफारिशें लागू कराने के लिए श्रमिक संघ के साथ संघर्ष किया और मामला दिल्ली हाईकोर्ट से होते हुए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। इस लड़ाई के दौरान उन्हें खुद न्यायाधीश के सामने पत्रकारों की ओर से पक्ष रखने का अवसर मिला। जीत के बाद उनके सामने विदेश में संवाददाता के रूप में काम करने और बेहतर वेतनमान का विकल्प था, लेकिन उन्होंने अपने साथियों का साथ छोड़ने के बजाय पत्रकारिता और श्रमिक अधिकारों की लड़ाई को प्राथमिकता दी। 1996 में द ट्रिब्यून से जुड़ने के बाद उन्होंने आतंकवाद के बाद के पंजाब को करीब से देखा और स्थानीय पत्रकारिता को नए सिरे से विकसित करने में भूमिका निभाई। द समर न्यूज से विशेष बातचीत में उन्होंने पत्रकारिता की स्वतंत्रता, बदलती तकनीक, श्रमिक अधिकारों और पंजाब की रिपोर्टिंग से जुड़े अनुभव साझा किए हैं। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश:-
आपकी पत्रकारिता यात्रा काफी लंबी और विविध रही है। अगर अपने करियर को देखें तो सबसे चुनौतीपूर्ण दौर कौन-सा रहा?
मेरे पत्रकारिता जीवन का सबसे चुनौतीपूर्ण वर्ष 1989 रहा, जब मैं द टाइम्स ऑफ इंडिया, लखनऊ में काम कर रहा था। उस समय मैं इलस्ट्रेटेड वीकली, धर्मयुग और टाइम्स समूह की अन्य पत्रिकाओं के लिए भी काफी लिखता था। इसी दौरान अखबार के कर्मचारियों की हड़ताल हुई। यह हड़ताल पत्रकारों के वेतन से जुड़े बछावत वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने को लेकर थी। प्रबंधन अक्सर वेतन बोर्ड की सिफारिशों के खिलाफ अदालत से स्थगन आदेश ले लेते थे, जिससे पत्रकारों को उसका लाभ नहीं मिल पाता था। हमने इस लड़ाई में श्रमिक संघ के साथ खड़े होने का फैसला किया। पत्रकारों के लिए उचित वेतन केवल व्यक्तिगत मुद्दा नहीं, बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता की बुनियाद से जुड़ा विषय है।
इस संघर्ष में आपकी भूमिका क्या रही?
मैं श्रमिक संघ के साथ सक्रिय रूप से जुड़ा और वेतन बोर्ड को लागू कराने की लड़ाई में शामिल हुआ। मामला दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंचा। वहां हमारी ओर से वकील सुनवाई के लिए समय पर नहीं पहुंच पाए। साथियों ने मुझे ही न्यायाधीश के सामने अपनी बात रखने के लिए भेज दिया। मैं कानून का विशेषज्ञ नहीं था, लेकिन याचिका तैयार करने की प्रक्रिया से जुड़ा होने के कारण पूरे मामले की बुनियादी जानकारी थी। न्यायाधीश ने मुझसे पूछा कि मेरा इस मामले में क्या अधिकार है। मैंने कहा कि पत्रकार भी श्रमिक हैं और मैं श्रमिकों की ओर से अपनी बात रखना चाहता हूं। न्यायालय ने मुझे बोलने की अनुमति दी। मैंने सुझाव दिया कि देश के अलग-अलग उच्च न्यायालयों में चल रहे संबंधित मामलों को एक साथ करके सर्वोच्च न्यायालय भेजा जाना चाहिए। इस सुझाव को स्वीकार किया गया और आगे मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा।
इस मामले का अंतिम परिणाम क्या रहा?
सर्वोच्च न्यायालय में मामले पर पूरे दिन बहस हुई। हमारे वकील आनंद त्रिवेदी ने दलीलें रखीं और अंततः पत्रकारों के पक्ष में महत्वपूर्ण आदेश आया। उनके अनुसार तत्काल प्रभाव से 100 प्रतिशत राहत दी गई। भटनागर ने इसे अपने पत्रकारिता करियर की बड़ी उपलब्धियों में से एक बताया।
इस जीत के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया प्रबंधन की ओर से आपको क्या प्रस्ताव मिला?
प्रबंधन के साथ मेरे व्यक्तिगत संबंध अच्छे थे। जीत के बाद उनसे पूछा गया कि मैं पत्रकारिता में रहना चाहता हूं या ट्रेड यूनियन के काम में आगे बढ़ना चाहता हूं। मैंने स्पष्ट किया कि मैं पत्रकार हूं और पत्रकार ही रहना चाहता हूं। इसके बाद मुझे कंपनी के विशेष वेतनमान पर रखने और संघ से अलग होने का सुझाव दिया गया। साथ ही विदेश में संवाददाता के रूप में काम करने का प्रस्ताव भी दिया गया। पाकिस्तान, काठमांडू और कोलंबो जैसे विकल्पों पर चर्चा हुई। उस समय कोलंबो में एलटीटीई का संघर्ष भी चल रहा था, इसलिए वहां की जिम्मेदारी पत्रकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती।
आपने आखिरकार विदेश जाने के प्रस्ताव को क्यों ठुकराया?
यह मेरे जीवन के सबसे कठिन फैसलों में से एक था। एक तरफ मेरे सामने पत्रकारिता में बड़ा अवसर था और दूसरी तरफ वे साथी थे जिनके साथ मैं वेतन और श्रमिक अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा था। मैंने अपने सहयोगियों को छोड़कर व्यक्तिगत करियर को प्राथमिकता देने के बजाय उनके साथ खड़े रहने का निर्णय लिया। बाद में यह प्रस्ताव वापस ले लिया गया और हड़ताल समाप्त होने के बाद मैंने संडे मेल में काम शुरू किया।
द ट्रिब्यून से आपका जुड़ाव कैसे हुआ?
मैं 1996 में द ट्रिब्यून से जुड़ा। जिस दिन मैं चंडीगढ़ पहुंचा, उसी दिन पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या हुई थी। मैं शताब्दी ट्रेन से चंडीगढ़ पहुंचा था। कार्यालय पहुंचते ही मुझे इस घटना की रिपोर्टिंग के लिए भेज दिया गया। इसके बाद मैंने पंजाब की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को समझने के लिए अमृतसर, लुधियाना, जालंधर और बठिंडा की यात्रा की। अमृतसर में स्वर्ण मंदिर और अन्य स्थानों पर रहकर अकाली राजनीति तथा उस समय के पंजाब के माहौल को समझने की कोशिश की।
उस समय पंजाब की स्थिति कैसी थी?
वह पंजाब के लिए संवेदनशील दौर था। 1996-97 के दौरान आतंकवाद का दौर समाप्ति की ओर था, लेकिन उसका असर और डर अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। उन्होंने बताया कि उस समय शाम के बाद सड़कों पर काफी सन्नाटा रहता था। यहां तक कि रात में घर की छत पर सोना भी लोग सुरक्षित नहीं मानते थे। इसी माहौल में उन्होंने पंजाब के अलग-अलग हिस्सों में जाकर लोगों, राजनीतिक परिस्थितियों और जमीनी हालात को समझने का प्रयास किया।
द ट्रिब्यून में आपका अनुभव कैसा रहा?
द ट्रिब्यून को अपने पत्रकारिता जीवन की सबसे संतोषजनक यात्राओं में से एक रही। वहां पत्रकारों को काम करने की पर्याप्त स्वतंत्रता थी और प्रबंधन का हस्तक्षेप बहुत कम था। तत्कालीन संपादक हरि जयसिंह की कार्यशैली की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। हरि जयसिंह दबाव के सामने मजबूती से खड़े होने वाले और सही-गलत के बीच अंतर करने वाले संपादक थे। उनके लिए पत्रकारिता में निष्पक्षता और पेशेवर स्वतंत्रता महत्वपूर्ण थी।
द ट्रिब्यून में आपकी नियुक्ति को लेकर भी एक दिलचस्प घटना सामने आई थी?
हां। जब मेरी नियुक्ति पर चर्चा हो रही थी, तब मेरी उम्र को लेकर सवाल उठा। मैं 32 वर्ष से कम उम्र का था और द ट्रिब्यून में सहायक संपादक के पद के लिए उम्र को लेकर आपत्ति जताई गई। हालांकि हरि जयसिंह ने मेरे पिछले अनुभव और काम को देखते हुए मेरा पक्ष लिया। मैंने पत्रकारिता बहुत कम उम्र में शुरू कर दी थी और 28 वर्ष की उम्र में टाइम्स ऑफ इंडिया में समाचार संपादक की जिम्मेदारी संभाल चुका था। इसलिए अंततः मेरी नियुक्ति का रास्ता साफ हुआ।
आपने द ट्रिब्यून में स्थानीय पत्रकारिता को लेकर क्या बदलाव किए?
उस समय अखबारों में तकनीकी बदलाव तेजी से हो रहे थे। उन्होंने बताया कि द ट्रिब्यून में काम करते हुए ऑनलाइन जाने और स्थानीय स्तर पर संस्करण शुरू करने की जरूरत महसूस हुई। उस समय ‘हाइपर-लोकल’ शब्द भी आम नहीं था। हमारी पहल और टीम के प्रयासों से चंडीगढ़, पटियाला, बठिंडा और लुधियाना जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित संस्करण शुरू किए गए। बाद में जालंधर और अमृतसर में भी विस्तार हुआ। स्थानीय संस्करणों का उद्देश्य पाठकों को उनके अपने क्षेत्र से जुड़ी खबरें अधिक प्रभावी तरीके से उपलब्ध कराना था।

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