मोहित प्रेम शर्मा एडिटर | द समर न्यूज (हिमाचल प्रदेश)
भारतीय राजनीति में लंबे समय से एक सवाल उठता रहा है- क्या नरेंद्र मोदी और अमित शाह की मजबूत राजनीतिक रणनीति के सामने विपक्ष कभी प्रभावी चुनौती खड़ी कर पाएगा? चुनाव दर चुनाव भाजपा की संगठनात्मक ताकत, नेतृत्व की आक्रामक शैली और विपक्ष की बिखरी हुई राजनीति इस बहस को नई दिशा देती रही है, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर छिड़े विवाद ने एक बार फिर इस सवाल को देश की राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
इस बार तस्वीर में एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई दे रहा है, विपक्ष केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस और संसद में बयानबाजी तक सीमित रहने के बजाय सड़कों पर उतर रहा है, एकजुटता दिखा रहा है और अपने आरोपों को संवैधानिक संस्थाओं तक ले जा रहा है, वोट चोर, गद्दी छोड़ का नारा इस राजनीतिक अभियान की पहचान बनकर उभरा है, विपक्ष इसे केवल एक व्यक्ति या एक पद का विवाद नहीं, बल्कि मताधिकार और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल बता रहा है। राष्ट्रपति भवन तक पहुंचा विवाद, विपक्ष ने दिया एकजुटता का संदेश 9 अक्टूबर को राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की, प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और विभिन्न विपक्षी दलों के प्रमुख नेता शामिल थे, विपक्ष ने ज्ञापन सौंपकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, एसआईआर प्रक्रिया पर रोक और चुनावी व्यवस्था में कथित अनियमितताओं की जांच सहित कई मांगें उठाईं।
यह मुलाकात राजनीतिक रूप से इसलिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि विपक्ष ने अपने विरोध को केवल सड़क तक सीमित नहीं रखा, उसने राष्ट्रपति के समक्ष अपना पक्ष रखने की कोशिश की और संवैधानिक स्तर पर हस्तक्षेप की मांग की। हालांकि, राष्ट्रपति से मुलाकात होना विपक्ष के आरोपों की पुष्टि नहीं है, आरोपों की सत्यता का निर्धारण तथ्यों, संबंधित संस्थाओं के जवाब और उचित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही होना चाहिए, फिर भी विपक्ष के लिए यह घटनाक्रम अपनी राजनीतिक मांगों को राष्ट्रीय विमर्श में बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण अवसर बना।
इससे पहले संसद से निर्वाचन आयोग की ओर मार्च करने की कोशिश, पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद प्रदर्शन और लगातार इस्तीफे की मांग ने इस विवाद को सुर्खियों में बनाए रखा, अब विपक्ष इस मुद्दे को आगे भी उठाने की तैयारी कर रहा है।
वोट चोर, गद्दी छोड़, नारा या नई रणनीति?
राजनीति में नारे केवल शब्द नहीं होते, वे किसी जटिल मुद्दे को जनता तक सरल भाषा में पहुंचाने का माध्यम बनते हैं, वोट चोर, गद्दी छोड़ नारे के जरिए विपक्ष चुनावी प्रक्रिया से जुड़े अपने आरोपों को सीधे राजनीतिक जवाबदेही के सवाल में बदलने की कोशिश कर रहा है। इस नारे की राजनीतिक ताकत इस बात पर निर्भर करेगी कि विपक्ष इसे कितनी विश्वसनीयता के साथ जनता के बीच ले जाता है, क्या वह अपने आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत प्रस्तुत कर पाएगा? क्या वह मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को स्पष्ट उदाहरणों के साथ समझा सकेगा? और क्या वह अलग अलग राज्यों में इस मुद्दे पर व्यापक जनसमर्थन जुटा सकेगा?
युवाओं की सक्रियता
इस घटनाक्रम का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू युवाओं की भागीदारी है, हाल के विरोध प्रदर्शनों में युवा कार्यकर्ताओं और नागरिक समूहों की सक्रियता ने इस विवाद को पारंपरिक दलगत राजनीति से आगे ले जाने की कोशिश की है। जब किसी राजनीतिक मुद्दे पर युवा अपनी आवाज बुलंद करते हैं, तो उसका असर केवल तत्कालीन सत्ता विपक्ष संघर्ष तक सीमित नहीं रहता, वह सोशल मीडिया, सार्वजनिक बहस और आने वाली पीढ़ियों की राजनीतिक सोच को भी प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम को केवल राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी या विपक्ष बनाम भाजपा के रूप में देखना ही पर्याप्त नहीं होगा।
}क्या मोदी शाह की रणनीति कमजोर पड़ रही है?
नरेंद्र मोदी व अमित शाह की राजनीतिक रणनीति की एक प्रमुख विशेषता रही है, संगठन, नेतृत्व और चुनावी संदेश को एक साथ साधना, इसके मुकाबले विपक्ष को अक्सर आपसी मतभेदों, नेतृत्व संबंधी सवालों और साझा रणनीति की कमी से जूझना पड़ा है, लेकिन ज्ञानेश कुमार विवाद में विपक्ष ने कम से कम एक स्तर पर अपनी रणनीति में बदलाव दिखाया है, अलग-अलग दलों के नेताओं का एक मंच पर आना, राष्ट्रपति से मुलाकात करना, सड़क पर विरोध जारी रखना और न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लेने की तैयारी करना बताता है कि विपक्ष इस मुद्दे को जल्दी छोड़ने के मूड में नहीं है। यहीं मोदी और शाह की रणनीति के सामने चुनौती पैदा होती है, यदि विपक्ष किसी एक मुद्दे पर लगातार एकजुट रहता है, तो सरकार के लिए राजनीतिक बहस को दूसरी दिशा में मोड़ना अपेक्षाकृत कठिन हो सकता है। हालांकि, यह कहना कि मोदी शाह की पूरी राजनीतिक रणनीति विफल हो गई है, अभी जल्दबाजी होगी, भाजपा का संगठनात्मक आधार, चुनावी समर्थन और राजनीतिक प्रभाव किसी एक विवाद से निर्धारित नहीं होते, इसी तरह विपक्ष की सड़कों पर दिखाई देने वाली एकजुटता चुनावी सफलता की गारंटी भी नहीं है।
विपक्ष के सामने भी कम चुनौतियां नहीं
विपक्ष की आक्रामकता को उसकी स्थायी सफलता मान लेना भी सही नहीं होगा। केवल आरोप लगाने से जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता, विपक्ष को यह भी बताना होगा कि वह चुनावी व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कौन से व्यावहारिक और संस्थागत सुधार चाहता है। इसी तरह, सरकार और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वे मतदाता सूची के पुनरीक्षण तथा चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़े सवालों पर स्पष्टता प्रदान करें, लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता राजनीतिक दलों की तात्कालिक जीत या हार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
असली लड़ाई राजनीतिक वर्चस्व की
ज्ञानेश कुमार विवाद अब एक व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुका है, एक तरफ विपक्ष इसे चुनावी निष्पक्षता और मताधिकार से जुड़ा मुद्दा बता रहा है, तो दूसरी तरफ इस विवाद का राजनीतिक असर केंद्र सरकार और भाजपा की रणनीति पर भी पड़ रहा है। विपक्ष के लिए अवसर है कि वह खोई हुई राजनीतिक धार को मजबूत करे, भाजपा के लिए यह चुनौती है कि वह उठाए गए सवालों का प्रभावी और विश्वसनीय जवाब दे, वहीं लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण कसौटी यह है कि जनता का भरोसा बना रहे। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्ष अपने अभियान को कितना व्यापक बनाता है।