समर न्यूज | जालंधर
पंजाब विधानसभा चुनाव में जीत और हार के बीच का अंतर कई बार इतना कम रहा है कि कुछ दर्जन वोटों ने उम्मीदवारों की राजनीतिक किस्मत बदल दी। राज्य में पिछले चुनावों के नतीजे बताते हैं कि मजबूत जनाधार और बड़े चुनावी दावों के बावजूद किसी उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित नहीं होती। फिल्लौर में 2012 के विधानसभा चुनाव में महज 31 मतों से फैसला हुआ था, जबकि दसूहा में 1997 के चुनाव में जीत का अंतर केवल 53 मत रहा था।
वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए ऐसे पुराने नतीजे फिर चर्चा में हैं। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में फिल्लौर सीट पर शिरोमणि अकाली दल के उम्मीदवार अविनाश चंद्र ने कांग्रेस के संतोख सिंह चौधरी को केवल 31 मतों से हराया था। दोनों उम्मीदवारों को लगभग 32.5 प्रतिशत मत मिले थे। इतने कम अंतर ने इस मुकाबले को राज्य के सबसे करीबी चुनावी नतीजों में शामिल कर दिया। इसी तरह दसूहा सीट पर 1997 में कांग्रेस के रोमेश चंद्र ने महंत राम प्रकाश को महज 53 मतों से पराजित किया था। दोनों उम्मीदवारों के मत प्रतिशत में भी बहुत मामूली अंतर था।
पट्टी और फिरोजपुर ग्रामीण में भी कांटे की टक्कर
वर्ष 2012 के चुनाव में पट्टी सीट पर शिरोमणि अकाली दल के आदेश प्रताप सिंह कैरों ने कांग्रेस के हरमिंदर सिंह गिल को 59 मतों से हराया था। कैरों को 47.79 प्रतिशत, जबकि गिल को 47.75 प्रतिशत वोट मिले थे। वर्ष 2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी के लालजीत सिंह भुल्लर ने कैरों को हराकर यह सीट जीत ली। फिरोजपुर ग्रामीण में 2012 के चुनाव के दौरान अकाली दल के जोगिंदर सिंह ने कांग्रेस की सत्कार कौर को 162 मतों से हराया था। वर्ष 2022 में इस सीट पर आम आदमी पार्टी के रजनीश कुमार दहिया ने जीत दर्ज की। जगरांव में भी 2012 में अकाली दल के शिव राम कलेर ने कांग्रेस के ईशर सिंह को 206 मतों से पराजित किया था।
}2022 में भी दिखी करीबी मुकाबलों की तस्वीर: पिछले विधानसभा चुनाव में जालंधर सेंट्रल सीट पर आम आदमी पार्टी के रमन अरोड़ा ने कांग्रेस के राजिंदर बेरी को 247 मतों से हराया था। डेरा बाबा नानक में कांग्रेस के सुखजिंदर सिंह रंधावा ने अकाली दल के रविकरण सिंह काहलों को 466 मतों से मात दी थी। ये नतीजे बताते हैं कि बहुकोणीय मुकाबलों में मतों का बंटवारा भी निर्णायक साबित हो सकता है।
}2027 के लिए दलों की रणनीति अहम: अगले विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के सामने इन करीबी मुकाबलों वाली सीटों पर बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने, मतदाताओं से सीधा संपर्क बढ़ाने और स्थानीय मुद्दों पर ध्यान देने की चुनौती होगी। हालांकि, पुराने नतीजों के आधार पर आगामी चुनाव का अनुमान लगाना उचित नहीं होगा। उम्मीदवारों, राजनीतिक गठबंधनों, जनसमर्थन और चुनावी मुद्दों में बदलाव से परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।