ईरान-इज़राइल टकराव में चीन ने निभाई सीमित भूमिका, दोस्ती से ज्यादा तवज्जो दी अपने हितों को

बीजिंग | जब दो हफ्ते पहले इज़राइल ने ईरान पर सैन्य हमला किया, तो चीन ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए संघर्ष पर चिंता जताई और युद्धविराम की अपील की। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस मुद्दे पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से संपर्क किया, और विदेश मंत्री वांग यी ने ईरानी समकक्ष अब्बास अरागची से बातचीत की। लेकिन इसके बाद चीन की सक्रियता अचानक थम गई।

ईरान का लंबे समय का रणनीतिक सहयोगी होने के बावजूद चीन ने इस बार सैन्य समर्थन से परहेज किया और केवल कूटनीतिक बयानबाज़ी तक खुद को सीमित रखा। विश्लेषकों का मानना है कि बीजिंग ने इस पूरे प्रकरण में अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को प्राथमिकता दी।

कूटनीति तक सिमटा समर्थन

‘रैंड’ थिंक टैंक के चीन मामलों के विशेषज्ञ जूड ब्लैंचैट का कहना है कि, “बीजिंग में न तो राजनीतिक साहस है और न ही त्वरित कूटनीतिक प्रतिक्रिया देने की क्षमता, जो इस तरह की अस्थिर परिस्थितियों में निर्णायक हस्तक्षेप कर सके।” उन्होंने कहा कि चीन पश्चिम एशिया में “जोखिम टालने वाली नीति” अपनाना पसंद करता है।

चीन ने वैश्विक मंच पर खुद को जिम्मेदार ताकत के रूप में पेश करते हुए क्षेत्र में संघर्ष विराम और वार्ता की अपील की, लेकिन ईरान को सैन्य सहायता देने या आर्थिक राहत मुहैया कराने से दूरी बनाए रखी।

चीन की आर्थिक चिंताएं

चीन को आशंका है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष उसके ऊर्जा आपूर्ति चक्र और आर्थिक हितों पर सीधा असर डाल सकता है। नानजिंग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर झू फेंग के मुताबिक, “चीन के लिए सबसे बड़ा खतरा क्षेत्रीय अस्थिरता है, जो उसके व्यापार और निवेश की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।”

ईरान की संसद द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य बंद करने की योजना को लेकर भी चीन ने विरोध जताया और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसके असर की चेतावनी दी।

तेल पर निर्भरता ने बढ़ाई चिंता

अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान से निर्यात होने वाले कच्चे तेल का 80-90% हिस्सा चीन खरीदता है। ऐसे में किसी भी सैन्य संकट के कारण अगर तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका असर चीन की औद्योगिक क्षमता पर पड़ सकता है।

पूर्व अमेरिकी अधिकारी और थिंक टैंक ‘फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज’ से जुड़े क्रेग सिंगलटन ने चीन की भूमिका को “मात्र तेल आपूर्ति बनाए रखने की कोशिश और कूटनीतिक अपील” करार दिया। उन्होंने कहा, “चीन ने कोई हथियार, ड्रोन या आपातकालीन आर्थिक मदद ईरान को नहीं दी।”

दिखावे तक सीमित साझेदारी?

विशेषज्ञों के अनुसार, चीन का उद्देश्य खाड़ी के देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंध मजबूत करना है, युद्ध में शामिल होना नहीं। चीन और ईरान की चर्चित रणनीतिक साझेदारी भी युद्धकाल में केवल औपचारिक समर्थन और बयानबाज़ी तक ही सिमट गई।

हालांकि, चीन ने संयुक्त राष्ट्र में रूस और पाकिस्तान के साथ मिलकर एक प्रस्ताव भी पेश किया, जिसमें ईरान के परमाणु स्थलों पर हमलों की निंदा और तत्काल युद्धविराम की अपील की गई थी।

Karuna

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