नई दिल्ली | कांग्रेस ने शनिवार को केंद्र सरकार पर न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाने की प्रक्रिया को लेकर पाखंड और दोहरे रवैये का आरोप लगाया। पार्टी प्रवक्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि सरकार ने केवल लोकसभा में प्रस्ताव शुरू करने की बात कहकर राज्यसभा की भूमिका को नजरअंदाज किया है, जबकि राज्यसभा के सभापति खुद इस प्रस्ताव की जानकारी पहले ही दे चुके हैं।
सिंघवी के अनुसार, 21 जुलाई को कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने राज्यसभा में प्रस्ताव का नोटिस दिया था, जिस पर 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे। साथ ही लोकसभा में भी 152 सांसदों ने समान प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। उन्होंने कहा कि जब राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने खुद प्रस्ताव का जिक्र किया और कानून मंत्री ने भी इसकी पुष्टि की, तो सरकार अब यह कहकर पल्ला क्यों झाड़ रही है कि राज्यसभा में कोई प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुआ।
सिंघवी ने इसे मोदी सरकार की “संवैधानिक असुरक्षा” बताते हुए कहा कि भाजपा सिर्फ दिखावे के लिए न्यायपालिका में पारदर्शिता की बात कर रही है, जबकि असल मकसद राजनीतिक फायदे का है। उन्होंने कहा कि अगर दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्ताव पेश होता है, तो नियमों के अनुसार जांच समिति का गठन दोनों पीठासीन अधिकारियों की सहमति से होना चाहिए।
कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए इसे “लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अवहेलना” बताया है।