6 अगस्त, 2025
हर वर्ष आने वाला खर मास, जिसे उत्तराखंड समेत कई क्षेत्रों में मलमास या काला महीना भी कहा जाता है, हिन्दू पंचांग में एक विशेष महत्व रखता है। परंपरागत रूप से इस समय शुभ विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन आदि मांगलिक कार्यों से परहेज़ किया जाता है। लेकिन क्या इसे केवल निषेधों का महीना मानना उचित है? जानकारों का मानना है – नहीं, बल्कि यह आत्मनिरीक्षण, साधना और संयम का महीना है।
खर मास: परंपरा और आध्यात्मिकता का संगम
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब सूर्य धनु राशि में होता है और गुरु के प्रभाव में आता है, तब खर मास आरंभ होता है। इस दौरान धार्मिक क्रियाएं, दान-पुण्य, ध्यान, जप और स्वाध्याय को अत्यंत शुभ माना गया है। कई श्रद्धालु इस माह में भगवद्गीता, रामायण और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करते हैं।
‘शुभ कार्य वर्जित’ नहीं, बल्कि ‘शुभ चिंतन हेतु अवसर’
पंडित राघव जोशी, एक ज्योतिषाचार्य, बताते हैं कि “खर मास जीवन की भागदौड़ से विराम लेने और आत्म-शुद्धि का समय है। जिस तरह प्रकृति शीतकाल में विश्राम करती है, वैसे ही मनुष्य भी इस काल में अपने भीतर झांकने का अवसर पाता है।”
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में विशेष पूजा-पाठ
गढ़वाल और कुमाऊँ के ग्रामीण क्षेत्रों में मलमास के दौरान विशेष सत्संग, हवन, कथा और सामूहिक भजन आयोजित होते हैं। महिलाएं इस महीने व्रत रखती हैं और परिवार के कल्याण हेतु भगवान विष्णु की पूजा करती हैं।
युवाओं में बढ़ती रुचि
खास बात यह है कि अब युवा वर्ग भी इस पावन मास को केवल ‘काला महीना’ मानने की बजाय उसे आध्यात्मिक डिटॉक्स के रूप में देखने लगा है। सोशल मीडिया पर भी #SpiritualDecember और #PauseToReflect जैसे ट्रेंड देखने को मिल रहे हैं।
संक्षेप में, खर मास कोई नकारात्मक समय नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक जागरूकता और आत्मविकास के लिए बेहद अनमोल है। जहां एक ओर मांगलिक कार्यों पर विराम लगता है, वहीं दूसरी ओर मन, वचन और कर्म को शुद्ध करने का द्वार खुलता है।
🕉️ खर मास को समझिए – रोक नहीं, रुककर बढ़ने का समय है।