नई दिल्ली | अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय आईटी पेशेवरों और विदेशी कर्मचारियों के लिए बड़ा फैसला लिया है। शुक्रवार को हस्ताक्षरित घोषणापत्र के अनुसार एच-1बी वीज़ा शुल्क वार्षिक 1,00,000 अमेरिकी डॉलर तक बढ़ा दिया गया है। इस कदम से अमेरिका में काम कर रहे लाखों भारतीय पेशेवरों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि H-1B वीज़ा का सबसे बड़ा लाभार्थी भारत है।
व्हाइट हाउस स्टाफ सचिव विल शार्फ ने कहा कि H-1B वीज़ा का “सबसे ज्यादा दुरुपयोग” हो रहा है। उनका दावा है कि यह प्रोग्राम ऐसे विदेशी पेशेवरों को अमेरिका लाता है जो उन सेक्टरों में काम करते हैं, जहाँ अमेरिकी कामगारों की मांग नहीं है। ट्रंप प्रशासन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल “वास्तव में असाधारण” और “उच्च कुशल” लोग ही अमेरिका में रोजगार पाएं, ताकि अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियों की सुरक्षा बनी रहे।
भारतीय पेशेवरों पर असर
H-1B वीज़ा का सबसे बड़ा लाभार्थी भारत है। आईटी और टेक्नोलॉजी सेक्टर में बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर इस वीज़ा पर अमेरिका में कार्यरत हैं। तीन साल के लिए मिलने वाले इस वीज़ा को अगले तीन साल तक नवीनीकृत किया जा सकता है, लेकिन बढ़े हुए शुल्क से भारतीय कंपनियों और कर्मचारियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ आएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भारतीय टैलेंट की अमेरिका तक पहुंच सीमित हो सकती है।
ग्रीन कार्ड और वेतन पर टिप्पणी
अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने कहा कि रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड प्रोग्राम के तहत हर साल लगभग 2.8 लाख लोग अमेरिका आते हैं, जिनकी औसत आय $66,000 होती है। उनके अनुसार इनमें से कई “निचले स्तर” के कर्मचारी होते हैं जो सरकारी सहायता कार्यक्रमों पर बोझ डालते हैं। लुटनिक ने कहा कि अब अमेरिका केवल “शीर्ष और असाधारण” पेशेवरों को ही चुनेगा। इस कदम से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को 100 अरब डॉलर से अधिक राजस्व मिलने की उम्मीद है।
ट्रंप का बयान
ओवल ऑफिस में दस्तखत करते हुए ट्रंप ने कहा, “हमें बेहतरीन और योग्य कामगारों की जरूरत है। यह फैसला सुनिश्चित करेगा कि अमेरिका में सिर्फ सबसे योग्य लोग आएं।” उन्होंने यह भी कहा कि वीज़ा से होने वाली आमदनी का इस्तेमाल करों में कटौती और कर्ज चुकाने में किया जाएगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से भारतीय आईटी कंपनियों और पेशेवरों के लिए अमेरिका में नौकरी की संभावनाएं और महंगी हो जाएंगी।