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हिमाचल में ‘मुख्यमंत्री कार्प मत्स्य पालन योजना’ से बदल रही ग्रामीण आजीविका की तस्वीर 

Dharamshala, Rahul Chawla 

हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा शुरू की गई मुख्यमंत्री कार्प मत्स्य पालन योजना ने राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता और आर्थिक सशक्तिकरण की नई कहानी लिखनी शुरू कर दी है। पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने वाले किसान और बेरोजगार युवा अब मछली पालन को एक स्थायी, लाभकारी और तकनीकी दृष्टि से आधुनिक व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं। इस योजना ने न केवल ग्रामीण आजीविका के नए रास्ते खोले हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन, पोषण सुरक्षा और महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

योजना का उद्देश्य — कृषि के साथ मछली पालन को बनाना स्थायी व्यवसाय

राज्य सरकार का उद्देश्य पारंपरिक कृषि के साथ-साथ मत्स्य पालन को ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन का मज़बूत माध्यम बनाना है। हिमाचल प्रदेश के उष्ण जलवायु वाले निचले क्षेत्रों में मीठे पानी में कार्प प्रजाति की मछलियों का पालन आसान और लाभदायक है। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने किसानों और युवाओं को मत्स्य पालन अपनाने के लिए आकर्षक प्रोत्साहन नीति बनाई है।

मत्स्य पालन विभाग के अनुसार, इस योजना के तहत तालाब निर्माण और प्रारंभिक वर्ष की इनपुट लागत (मछली बीज, चारा, औषधि आदि) पर सरकार द्वारा 80 प्रतिशत तक का अनुदान (सब्सिडी) प्रदान किया जा रहा है। प्रति हेक्टेयर 12.40 लाख रुपये की यूनिट लागत निर्धारित की गई है, जिसमें से 8.40 लाख रुपये तालाब निर्माण और 4 लाख रुपये इनपुट सामग्री पर खर्च किए जाते हैं।

युवाओं, महिलाओं और कमजोर वर्गों को प्राथमिकता

इस योजना का एक बड़ा उद्देश्य ग्रामीण युवाओं, महिलाओं और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को आत्मनिर्भर बनाना है। इसके लिए बेरोजगार युवाओं, महिलाओं और अनुसूचित जाति व जनजाति के आवेदकों को प्राथमिकता दी जाती है। पात्र लाभार्थी के पास स्वयं की भूमि या कम से कम सात वर्षों के लिए पट्टे पर ली गई भूमि होना अनिवार्य है।योजना के तहत 0.05 हेक्टेयर से लेकर 1 हेक्टेयर तक के क्षेत्रफल में तालाब निर्माण की अनुमति दी जाती है। आवेदन स्वीकृत होने के बाद मत्स्य विभाग द्वारा स्थल निरीक्षण, तकनीकी सलाह, प्रशिक्षण और निगरानी की पूरी व्यवस्था की जाती है।

तकनीकी प्रशिक्षण और सहायता — सफलता की कुंजी

मत्स्य विभाग केवल वित्तीय सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि वह लाभार्थियों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और विपणन सहायता भी प्रदान करता है।
विभाग द्वारा दिए जाने वाले प्रशिक्षण में शामिल हैं:

  • मछली बीज चयन और पालन तकनीक
  • तालाब की जल गुणवत्ता प्रबंधन
  • रोग नियंत्रण एवं औषधि उपयोग
  • फीड (चारा) प्रबंधन
  • मछली विपणन और लाभ गणना

इसके अलावा, मत्स्य सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों को भी योजना में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि सामूहिक रूप से उत्पादन और विपणन नेटवर्क को सुदृढ़ बनाया जा सके।

ग्रामीण क्षेत्रों में बदलती तस्वीर — सफलता की मिसालें

लवली कुमार, गांव बदुई (तहसील नूरपुर)

गांव परगना डाकघर बदुई के लवली कुमार बताते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री कार्प मत्स्य पालन योजना के तहत 1 लाख 39 हजार रुपये की सब्सिडी मिली है। विभाग ने उन्हें मछली बीज, चारा और तकनीकी मार्गदर्शन भी प्रदान किया।लवली बताते हैं कि मछली पालन से अब उन्हें स्थायी आय मिल रही है। उन्होंने दो अन्य ग्रामीणों को भी इस कार्य से जोड़ा है। उनका कहना है कि इस योजना ने गांव के युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए रास्ते खोले हैं। वे मुख्यमंत्री  सुखविंदर सिंह सुक्खू का आभार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि यह योजना ग्रामीण आत्मनिर्भरता की दिशा में एक सशक्त कदम है।

राकेश कुमार, गांव परगना (तहसील नूरपुर)

राकेश कुमार और उनके परिवार ने विभाग की सहायता से अपने खेत में तालाब निर्माण करवाया। उन्हें योजना के अंतर्गत 1 लाख 24 हजार रुपये की सब्सिडी प्रदान की गई। राकेश बताते हैं कि इस कार्य में उनके साथ दो अन्य व्यक्ति भी जुड़े हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़े हैं।
वे कहते हैं कि पहले खेती से सीमित आमदनी होती थी, पर अब मछली पालन से हर माह स्थिर आय प्राप्त हो रही है।

रमेश चंद्र, गांव जखाड़ा (तहसील फतेहपुर)

रमेश चंद्र ने योजना के तहत 1 लाख 3 हजार रुपये की सब्सिडी प्राप्त कर 1,050 वर्ग मीटर क्षेत्र में तालाब का निर्माण किया है। वे बताते हैं कि उन्हें मत्स्य बीज और फीड की सहायता विभाग से मिली।
रमेश कहते हैं, “यह योजना मेरे जैसे ग्रामीणों के लिए वरदान है। अब मैं न केवल खुद आत्मनिर्भर हूं, बल्कि अन्य युवाओं को भी इस दिशा में प्रेरित कर रहा हूं।

मत्स्य विभाग की भूमिका — 80 प्रतिशत अनुदान से ग्रामीणों को प्रोत्साहन

सहायक निदेशक मत्स्य पालन पौंग जलाशय, संदीप कुमार बताते हैं कि मुख्यमंत्री कार्प मत्स्य पालन योजना ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा देने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। योजना के तहत सभी वर्गों — अनुसूचित जाति, जनजाति और सामान्य — को समान रूप से 80 प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा है।उन्होंने बताया कि एक हेक्टेयर तालाब की यूनिट लागत 12.40 लाख रुपये तय की गई है, जिसके अनुसार पात्र लाभार्थियों को लगभग 9.92 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता प्राप्त हो सकती है।

संदीप कुमार ने बताया कि योजना का उद्देश्य केवल रोजगार सृजन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विविधता देना और सतत विकास को बढ़ावा देना भी है। उन्होंने कहा कि विभाग लगातार लाभार्थियों की निगरानी करता है ताकि उन्हें तकनीकी व विपणन संबंधी कोई कठिनाई न हो।

सरकार की मंशा — आत्मनिर्भर हिमाचल की ओर

उपायुक्त हेमराज बैरवा ने बताया कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए हिमाचल सरकार स्थानीय संसाधनों के अनुरूप योजनाओं को बढ़ावा दे रही है।उन्होंने कहा, “मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में युवाओं के पास अपार संभावनाएं हैं। सरकार उनकी हर संभव सहायता कर रही है ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।उन्होंने बताया कि पोंग बांध क्षेत्र और निचले इलाकों में इस योजना का विशेष प्रभाव देखने को मिल रहा है। यहाँ के मछुआरे समुदाय ने इस योजना का लाभ उठाकर आर्थिक रूप से सशक्त होने की दिशा में सराहनीय प्रगति की है।उपायुक्त ने यह भी कहा कि सरकार आने वाले समय में मत्स्य पालन के आधुनिकीकरण, कोल्ड स्टोरेज, फिश प्रोसेसिंग और मार्केटिंग नेटवर्क को और मज़बूत करने की दिशा में कार्य कर रही है।उन्होंने बताया कि विभाग सफल लाभार्थियों की कहानियाँ साझा कर रहा है, ताकि अन्य किसान भी प्रेरित होकर योजना का लाभ उठा सकें।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा

हिमाचल प्रदेश में मत्स्य पालन अब केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि ग्राम्य विकास का नया स्तंभ बनकर उभर रहा है। इस योजना से न केवल ग्रामीणों की आय बढ़ रही है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार, पोषण सुरक्षा और सामुदायिक सशक्तिकरण में भी वृद्धि हो रही है।मुख्यमंत्री कार्प मत्स्य पालन योजना ने यह साबित किया है कि यदि सही नीति, तकनीकी सहयोग और सरकारी समर्थन मिले, तो ग्रामीण क्षेत्रों के संसाधन भी आर्थिक समृद्धि का आधार बन सकते हैं।

Chandrika

chandrika@summerexpress.in

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