Nurpur, Sanjeev Mahajan-:हिमाचल प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान जहां प्रदेश भर से बेरोजगारी, दशकों से लंबित सड़कों के निर्माण, न्यूनतम वेतन, पेंशन बहाली और बुनियादी विकास कार्यों से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रतिनिधिमंडल लगातार शिमला में सरकार से मुलाकात कर रहे हैं, वहीं सदन के भीतर एक अलग ही तस्वीर उभर रही है। जनहित से जुड़े बड़े मसलों पर राजनीतिक दलों के बीच सहमति नज़र नहीं आती, लेकिन विधायकों के वेतन और भत्तों में बढ़ोतरी के मामले में सभी दलों की एकजुटता ने आम जनता को हैरान कर दिया है।
न्यू पेंशन स्कीम दस वर्ष से कम सेवाकाल वाले रिटायर्ड कर्मचारी-अधिकारी महासंघ, हिमाचल प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. संजीव गुलेरिया ने इस स्थिति पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि जनता वर्षों से उम्मीद लगाए बैठी है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि बेरोजगार युवाओं, पेंशनधारकों और गांव-गांव में अटके विकास कार्यों की वास्तविक आवाज़ सरकार तक पहुंचाएंगे, लेकिन इसके विपरीत विधायक अपने वेतन–भत्तों के मुद्दे पर पहले से कहीं अधिक सक्रिय दिख रहे हैं।डॉ. गुलेरिया के अनुसार, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जनहित के मुद्दों पर विधायक एक स्वर में बात करने को तैयार नहीं, जबकि स्वयं से जुड़े मामलों पर अचानक उनकी एकता मजबूत हो जाती है। यह जनता की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने का सबसे बड़ा प्रमाण है।उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि सरकार अक्सर पेंशन सुधारों और कर्मचारियों की मांगों पर “खजाना खाली” होने का तर्क देती है, जबकि विधायकों के वेतन–भत्तों में बढ़ोतरी के लिए वित्तीय सीमाए अचानक गायब हो जाती हैं।
इस बीच नेता प्रतिपक्ष द्वारा सदन में दिए एक बयान ने भी राजनीतिक माहौल गर्मा दिया है। उन्होंने संकेत दिया कि सरकार द्वारा लिए गए कुछ जनहितैषी निर्णयों की पुनः समीक्षा या निरस्तीकरण हो सकता है। बाद में सफाई देते हुए उन्होंने कहा कि उनका बयान संदर्भ से हटकर प्रस्तुत किया गया, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह “अनावश्यक भ्रम और असंगत राजनीतिक संदेश” पैदा करने वाला कदम साबित हुआ है।