कैथल। कैथल जिले में अवैध कॉलोनियों के तेजी से फैलते जाल को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। विजिलेंस विभाग की प्राथमिक जांच में सामने आया है कि बिना अनुमति विकसित की गई इन कॉलोनियों के कारण सरकारी खजाने को 105 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। माना जा रहा है कि यह नुकसान कॉलोनाइजरों द्वारा लाइसेंस शुल्क और अन्य अनिवार्य चार्ज जमा न कराने से हुआ। मामले को गंभीर मानते हुए विजिलेंस ने डीटीपी और नगर परिषद से पिछले 10 वर्षों का पूरा रिकार्ड तलब किया है।
जांच में यह तथ्य भी सामने आया है कि जिले में 85 से अधिक अवैध कॉलोनियों का विकास किया गया, जबकि डीटीपी के आधिकारिक रिकॉर्ड में केवल 75 कॉलोनियों का उल्लेख है। इनमें से कई कॉलोनियां 5 एकड़ से कम क्षेत्रफल में फैली मिलीं, जो नियमों के अनुसार कॉलोनी विकसित करने योग्य नहीं थीं। वहीं लगभग 70 कॉलोनियां ऐसी पाई गईं, जिनका क्षेत्रफल 5 एकड़ या उससे अधिक है। नियमों के अनुसार 5 एकड़ की कॉलोनी के लिए कॉलोनाइजर को 1.5 करोड़ रुपये जमा करना अनिवार्य है, जबकि कई कॉलोनियां 10 एकड़ तक पाई गईं, जिन पर 3 करोड़ रुपये तक का शुल्क बनता है।
जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि कई कॉलोनाइजर स्थानीय राजनीतिक हस्तियों से जुड़े हुए हैं। उनकी कथित शह पर अवैध कॉलोनियों का विस्तार वर्षों तक जारी रहा। अब विजिलेंस यह पता लगाने में जुटी है कि विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से ये अनियमितताएं कैसे चलती रहीं और समय पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
विजिलेंस ने डीटीपी और नगर परिषद से विस्तृत रिकार्ड मांगा है, जिसमें यह जानकारी तलब की गई है कि पिछले दशक में कितनी अवैध कॉलोनियां काटी गईं, किन कॉलोनाइजरों को नोटिस जारी हुए, कितनी बार कार्रवाई की गई, किन मामलों में एफआईआर दर्ज हुई और विभागीय स्तर पर कौन से अधिकारी इसमें लापरवाह या शामिल पाए गए। प्राप्त रिकार्ड की जांच जारी है और बाकी दस्तावेज मिलते ही विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
विजिलेंस इंस्पेक्टर सूबे सिंह ने बताया कि रिकार्ड के आधार पर अवैध कॉलोनियों से सरकार को हुए कुल आर्थिक नुकसान का सटीक आंकलन किया जा रहा है। रिपोर्ट तैयार होने के बाद इसे मुख्यालय भेजा जाएगा, जहां से आगे की कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई शुरू की जाएगी।