नई दिल्ली | ‘पीएफएएस’ (PFAS) – यह ऐसे रसायन हैं जो कभी खत्म नहीं होते और अब भारत में स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गए हैं। यूरोप और अमेरिका में इन जहरीली तकनीकों और फैक्ट्रियों को बंद किया जा चुका है, लेकिन अब इन्हें चुपचाप भारत में स्थानांतरित किया जा रहा है।
PFAS क्या है और क्यों इसे कहते हैं ‘फॉरएवर केमिकल’?
PFAS (पर- और पॉलीफ्लोरोअल्काइल पदार्थ) रसायनों का ऐसा समूह है जो प्रकृति में नष्ट नहीं होता। एक बार यह शरीर, पानी या मिट्टी में प्रवेश कर जाए, तो हमेशा वहां जमा रहता है। हाल ही में हुई रिसर्च में भारत में भूजल, पीने के पानी और माताओं के दूध में PFAS के अवशेष पाए गए हैं।
यूरोप ने इन फैक्ट्रियों को बंद किया, भारत ने क्यों अपनाया?
इटली और यूरोप के अन्य देशों में PFAS फैक्ट्रियों के कारण लाखों लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हुए। इसके बाद कड़े कानून बनाकर इन्हें बंद कर दिया गया। अब वही कंपनियां भारत की ओर रुख कर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ‘Ease of Doing Business’ के नाम पर भविष्य की पीढ़ियों के स्वास्थ्य को जोखिम में डाला जा रहा है।
PFAS के खतरनाक असर और इलाज की कमी
एक बार शरीर में प्रवेश करने के बाद PFAS को बाहर निकालने का कोई तरीका नहीं है। यह कैंसर, किडनी फेल्योर, बांझपन और हार्मोनल असंतुलन जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। यदि समय रहते कड़े नियम लागू नहीं किए गए, तो भारत जहरीले कचरे का केंद्र बन सकता है।
सावधानी और सुझाव
विशेषज्ञों की सलाह है कि पीने के पानी, फूड पैकेजिंग और पर्यावरणीय जोखिमों पर सतर्क नजर रखी जाए। साथ ही सरकार को कड़े नियम और निगरानी लागू करनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखा जा सके।