चंडीगढ़। हरियाणा के श्रम विभाग में सामने आए करीब 1500 करोड़ रुपये के वर्कस्लिप घोटाले को मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने बेहद गंभीरता से लिया है। कार्यपर्चियों के सत्यापन और श्रमिकों के पंजीकरण में हुई भारी अनियमितताओं की जांच के लिए मुख्यमंत्री ने उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन किया है, जो एक महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी।
इस मामले का खुलासा श्रम मंत्री अनिल विज ने अपने ही विभाग में किया था। वर्कस्लिप के आधार पर ही श्रमिकों को श्रम विभाग की विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाता है, ऐसे में बड़ी संख्या में फर्जी दस्तावेज सामने आने से पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े हो गए हैं। अनिल विज ने इस घोटाले की उच्चस्तरीय जांच की सिफारिश मुख्यमंत्री से की थी।
सूत्रों के अनुसार, श्रम विभाग की ओर से पहले मुख्यमंत्री को एक फाइल भेजी गई थी, जिसमें बताया गया था कि विभाग ने जांच के लिए आंतरिक समिति गठित कर ली है और 13 जिलों की रिपोर्ट तैयार हो चुकी है, जबकि 9 जिलों की रिपोर्ट अब भी लंबित है। मुख्यमंत्री ने इस अधूरी रिपोर्ट पर नाराजगी जताते हुए फाइल तुरंत वापस भेज दी और सभी जिलों की पूर्ण व अंतिम रिपोर्ट के साथ वित्तीय नुकसान का सटीक ब्यौरा तलब किया।
आरोप है कि बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को भवन निर्माण श्रमिक के रूप में पंजीकृत कर दिया गया, जिन्होंने वास्तव में निर्माण कार्य किया ही नहीं था। इससे सरकारी योजनाओं का गलत लाभ उठाया गया और विभाग को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने आईएएस पंकज अग्रवाल की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की है। समिति में आईएएस राजीव रतन और आईपीएस पंकज नैन को सदस्य बनाया गया है। यह समिति पूरे घोटाले की जांच करेगी, जिम्मेदार अधिकारियों और अन्य लोगों की भूमिका तय करेगी तथा भविष्य में ऐसी गड़बड़ियों को रोकने के लिए सुधारात्मक सुझाव भी देगी।
जांच में चौंकाने वाले आंकड़े
श्रम मंत्री अनिल विज के अनुसार, 13 जिलों—करनाल, रेवाड़ी, नूंह (मेवात), महेंद्रगढ़, गुरुग्राम, झज्जर, पलवल, पानीपत, रोहतक, सोनीपत, पंचकूला, सिरसा और कैथल—में कुल 5,99,758 वर्कस्लिप जारी की गई थीं। जांच में इनमें से केवल 53,249 वर्कस्लिप वैध पाई गईं, जबकि 5,46,509 वर्कस्लिप अवैध निकलीं।
इसी तरह, 2,21,517 श्रमिक पंजीकरणों की जांच में सिर्फ 14,240 श्रमिक पात्र पाए गए, जबकि 1,93,756 पंजीकरण फर्जी सामने आए। इन आंकड़ों ने विभागीय लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार की गंभीरता को और उजागर कर दिया है।
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