मुंबई। कच्चे तेल को लेकर भारत के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर की गई कार्रवाई के बाद जहां वैश्विक बाजार में तेल आपूर्ति बढ़ने की संभावनाएं बनी हैं, वहीं ओपेक प्लस देशों ने फिलहाल उत्पादन स्तर में किसी तरह का बदलाव न करने का निर्णय लिया है। इस फैसले से अल्पावधि में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल की आशंका कम हो गई है और बाजार में नरमी देखने को मिली है।
बीते कुछ दिनों से यमन में जारी संघर्ष और वेनेजुएला को लेकर बनी अनिश्चितता के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी की आशंका जताई जा रही थी। हालांकि मौजूदा हालात में कीमतें फिर से उन स्तरों की ओर लौटती दिख रही हैं, जिन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संतुलित और अनुकूल माना जाता है।
तेल कीमतों में गिरावट, सप्लाई बढ़ने की उम्मीद
मंगलवार को कच्चे तेल के दामों में गिरावट दर्ज की गई। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लिए जाने के बाद वहां कच्चे तेल के उत्पादन और निर्यात में बढ़ोतरी संभव है। इसके साथ ही कमजोर वैश्विक मांग के बीच इस वर्ष तेल की आपूर्ति पर्याप्त रहने की उम्मीद भी कीमतों पर दबाव बना रही है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 0.4 प्रतिशत गिरकर 61.5 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड 0.5 प्रतिशत टूटकर लगभग 58 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता नजर आया। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत जैसी तेल आयातक अर्थव्यवस्था के लिए यह स्थिति तब ज्यादा फायदेमंद मानी जाती है, जब कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 60 डॉलर या उससे नीचे बनी रहें।
ओपेक प्लस की रणनीति पर टिकी बाजार की नजर
क्रूड बाजार की नजर ओपेक प्लस देशों की रणनीति पर भी बनी हुई है। वेनेजुएला पर कार्रवाई के बाद हुई ओपेक प्लस की बैठक में इस मुद्दे पर कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया और उत्पादन को मौजूदा स्तर पर बनाए रखने का ऐलान किया गया। इससे यह संकेत मिला है कि फिलहाल संगठन बाजार में स्थिरता बनाए रखना चाहता है।
दुनिया के करीब आधे कच्चे तेल का उत्पादन करने वाले ओपेक प्लस देशों की यह बैठक ऐसे समय में हुई है, जब वर्ष 2025 में अब तक तेल की कीमतों में 18 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। इसे वर्ष 2020 के बाद सबसे बड़ी सालाना गिरावट माना जा रहा है, जिससे ओवरसप्लाई को लेकर चिंताएं और गहरी हो गई हैं।
विशेषज्ञों की राय
Rystad Energy के विश्लेषक और ओपेक के पूर्व अधिकारी जॉर्ज लियोन का कहना है कि फिलहाल तेल बाजार पर मांग और आपूर्ति से अधिक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का प्रभाव दिखाई दे रहा है। उनके अनुसार, ओपेक प्लस इस समय किसी आक्रामक फैसले के बजाय बाजार को संतुलित रखने की नीति अपना रहा है।
उन्होंने बताया कि ओपेक की अगली अहम बैठक 1 फरवरी को प्रस्तावित है, जिस पर वैश्विक बाजार की पैनी नजर रहेगी। इस बैठक से आगे की कीमतों की दिशा तय होने की उम्मीद है।