नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से लाखों नाम हटाए जाने के आरोपों को लेकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद डोला सेन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया है। अदालत ने चुनाव आयोग से एक सप्ताह के भीतर जवाब तलब करते हुए इस मामले को चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा अहम मुद्दा बताया है।
डोला सेन ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान चुनाव आयोग ने वैध दस्तावेजों को मान्यता देने से इनकार किया, जिसके चलते ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बड़ी संख्या में नाम काट दिए गए। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में दलील दी कि आयोग अलग-अलग चुनाव अधिकारियों को व्हाट्सऐप संदेशों और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए निर्देश दे रहा है, जबकि ऐसे निर्देश लिखित रूप में होने चाहिए थे।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जोयमल्या बागची की पीठ ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आयोग के वकील से निर्धारित समयसीमा में जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 19 जनवरी को तय की गई है। याचिकाकर्ता ने दावा-आपत्तियां दाखिल करने की 15 जनवरी की डेडलाइन बढ़ाने की भी मांग की है।
याचिका के अनुसार, 16 दिसंबर को प्रकाशित बंगाल की ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल से कुल 58,20,898 नाम हटा दिए गए। आरोप है कि यह कार्रवाई बिना किसी पूर्व सूचना या व्यक्तिगत सुनवाई के की गई। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि स्थायी निवास प्रमाण पत्र, पंचायत निवास प्रमाण पत्र और फैमिली रजिस्टर जैसे दस्तावेजों को मतदाता सूची में शामिल करने के लिए वैध माना जाए।
याचिका में यह भी कहा गया है कि 2025 के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के बाद मतदाताओं की संख्या 7,66,37,529 से घटकर 7,08,16,616 रह गई है। कई विधानसभा क्षेत्रों में अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट (ASDD) श्रेणी के मतदाताओं के नाम कथित तौर पर केंद्रीय स्तर पर प्रोसेस कर ‘डिस्पोज्ड—फॉर्म 7’ के रूप में चिह्नित कर दिए गए, जो तय प्रक्रिया के विपरीत है।
डोला सेन ने आशंका जताई है कि अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद राज्य विधानसभा चुनावों की घोषणा जल्द हो सकती है। ऐसे में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि वह मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करे और सभी पात्र मतदाताओं के नाम सूची में शामिल किए जाएं।