अंबाला छावनी। केंद्रीय बजट 2026–27 पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए चित्रा सरवारा ने कहा कि यह बजट जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता और ज़मीनी हकीकत से कटे प्रशासनिक औपचारिकताओं का दस्तावेज़ बनकर रह गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों की आय, युवाओं के भविष्य और मध्यम वर्ग को राहत जैसे बुनियादी मुद्दों पर चुप्पी साध ली है, जबकि बड़े आंकड़ों और तकनीकी शब्दावली के सहारे बजट को आकर्षक दिखाने का प्रयास किया गया।
चित्रा सरवारा ने कहा कि वित्तीय दृष्टि से यह बजट न तो घरेलू मांग को मजबूती देता है और न ही छोटे व्यापारियों तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कोई ठोस सहारा प्रदान करता है। रोजगार सृजन और सामाजिक सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय बजट में हाशिये पर चले गए हैं, जिससे आम आदमी की चिंताएँ और गहरी हुई हैं।
उन्होंने आगे कहा कि यह बजट संवेदना से अधिक संरचना का प्रतीक है, जिसमें आम आदमी की थाली, किसान की फसल और युवा की नौकरी का स्पष्ट रोडमैप कहीं दिखाई नहीं देता। सच्चा विकास वही होता है, जो अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, लेकिन इस बजट में वह दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से अनुपस्थित है।
अंत में चित्रा सरवारा ने कहा कि देश की जनता अब केवल घोषणाएँ नहीं, बल्कि ठोस परिणाम चाहती है—और यही इस बजट की सबसे बड़ी कमी है।