चंडीगढ़। अंतरजातीय विवाह के चलते करीब 18 वर्ष पहले हुए चर्चित मनोज-बबली हत्याकांड में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने हरियाणा पुलिस के उस सिपाही की बर्खास्तगी को बरकरार रखा है, जिस पर दंपती की लोकेशन आरोपियों तक पहुंचाने का गंभीर आरोप था। अदालत ने साफ कहा कि इस मामले में विभागीय कार्रवाई में हस्तक्षेप करना न्याय के हितों के विपरीत होगा।
जस्टिस जगमोहन बंसल ने सिपाही जय इंदर द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता मनोज और बबली की सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस टीम का हिस्सा था। कोर्ट ने माना कि जय इंदर को दंपती की लोकेशन की जानकारी थी और उसने यह जानकारी आरोपी गुरदेव सिंह तक पहुंचाई। अदालत ने इस कृत्य को बेहद निंदनीय और गंभीर लापरवाही करार दिया।
कोर्ट में बताया गया कि घटना के दिन थाना प्रभारी जगबीर सिंह ने दंपती को करनाल जाने के लिए हरियाणा रोडवेज बस में बैठने की अनुमति दी थी। इसके बाद दोनों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। कॉल डिटेल रिकॉर्ड और फोन बातचीत से यह संकेत मिले कि एसएचओ, याचिकाकर्ता और आरोपी के बीच संपर्क बना हुआ था।
हरियाणा सरकार ने कोर्ट में दलील दी कि गुरदेव सिंह को हत्या के मामले में दोषी ठहराया जा चुका है। ट्रायल कोर्ट ने उसे पहले मृत्युदंड दिया था, जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया। राज्य सरकार ने कहा कि लोकेशन लीक करना जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है, इसलिए बर्खास्तगी पूरी तरह उचित है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि विभागीय जांच में जय इंदर को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिला था और जांच प्रक्रिया में कोई कानूनी खामी नहीं पाई गई। इसी आधार पर कोर्ट ने बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।