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पराली से गिफ्ट आइटम बनाकर रोजगार कमा रहा कलाकार, ढालपुर के गांधी शिल्प बाजार में सजी अनोखी प्रदर्शनी

कुल्लू, मनमिंदर अरोड़ा-:उत्तर भारत के कई राज्यों में धान की फसल कटने के बाद किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या पराली की होती है। पराली के निपटान के लिए अक्सर किसान खेतों में आग लगा देते हैं, जिससे भारी मात्रा में धुआं फैलता है और यह धुआं आसपास के शहरों और गांवों में वायु प्रदूषण का कारण बन जाता है। हर साल यह समस्या इतनी गंभीर हो जाती है कि कई राज्यों की सरकारों को इससे निपटने के लिए विशेष अभियान चलाने पड़ते हैं। पराली के धुएं से न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है बल्कि लोगों को सांस से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों का सामना भी करना पड़ता है।

इसी समस्या को अवसर में बदलने का काम पश्चिम बंगाल के एक कलाकार कर रहे हैं। यह कलाकार धान की पराली से ग्रीटिंग कार्ड, पेंटिंग और विभिन्न प्रकार के गिफ्ट आइटम बनाकर न केवल अपनी आजीविका चला रहे हैं, बल्कि लोगों को यह भी संदेश दे रहे हैं कि पराली को जलाने के बजाय उसका उपयोग कर आय के नए साधन विकसित किए जा सकते हैं।

हिमाचल प्रदेश के जिला कुल्लू के मुख्यालय ढालपुर मैदान में इन दिनों गांधी शिल्प बाजार सजा हुआ है। इस शिल्प बाजार में देश के विभिन्न राज्यों से आए कारीगर अपने हस्तशिल्प उत्पादों की प्रदर्शनी लगा रहे हैं। इसी बाजार में पश्चिम बंगाल के कैनिंग से आए कलाकार चिन्मोय गोलदार ने भी अपना स्टॉल लगाया है। उनके स्टॉल पर धान की पराली से बनाई गई पेंटिंग, ग्रीटिंग कार्ड और कई सजावटी गिफ्ट आइटम प्रदर्शित किए गए हैं। यह अनोखी कलाकृतियां देखने के लिए मेला देखने आने वाले लोग खास तौर पर उनके स्टॉल पर पहुंच रहे हैं और कई लोग इन वस्तुओं को खरीदकर अपने घर भी ले जा रहे हैं।

चिन्मोय गोलदार का कहना है कि धान की पराली से इस तरह के उत्पाद तैयार करने का विचार उन्हें कई साल पहले मिला था। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल में भी पराली की समस्या काफी गंभीर है और वहां भी किसान अक्सर इसे जलाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में उन्होंने सोचा कि यदि पराली का रचनात्मक उपयोग किया जाए तो इससे पर्यावरण को भी लाभ होगा और लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।उन्होंने बताया कि वह यह काम वर्ष 1995 से कर रहे हैं। उस समय अमेरिका की एक संस्था उनके इलाके में आई थी, जिसने स्थानीय लोगों को पराली और प्राकृतिक संसाधनों से सजावटी वस्तुएं बनाने का प्रशिक्षण दिया था। उसी प्रशिक्षण से प्रेरित होकर उन्होंने इस कला को सीखना शुरू किया। हालांकि बाद में वह संस्था वहां से चली गई और अधिक लोग इस काम से नहीं जुड़ पाए, लेकिन चिन्मोय गोलदार ने इस कला को जारी रखा और धीरे-धीरे इसे अपने रोजगार का साधन बना लिया।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2006 के बाद से वह देश के विभिन्न राज्यों में लगने वाले शिल्प मेलों और प्रदर्शनियों में अपने उत्पादों के साथ भाग लेने लगे। अब वह अलग-अलग राज्यों में जाकर अपनी कलाकृतियों का प्रदर्शन करते हैं और लोगों को इस अनोखी कला के बारे में जानकारी देते हैं।

चिन्मोय गोलदार के अनुसार इस काम में किसी भी प्रकार के कृत्रिम रंग का प्रयोग नहीं किया जाता। धान की कटाई के बाद जो पराली खेतों में बच जाती है, उसे इकट्ठा करके रात के समय खुले आसमान के नीचे रखा जाता है। रात में ओस की बूंदें पराली पर गिरती हैं, जिससे उसका प्राकृतिक रंग और भी निखर कर सामने आता है।पराली को लगभग तीन से पांच दिनों तक खुले में रखा जाता है। इस प्रक्रिया के बाद उसका रंग सुनहरा हो जाता है और उसमें अलग-अलग डिजाइन बनाने के लिए उसे आसानी से उपयोग किया जा सकता है। इस तरह बिना किसी रासायनिक रंग के ही पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से सुंदर कलाकृतियां तैयार की जाती हैं।उन्होंने बताया कि वह अकेले ही यह काम कर रहे हैं और अपनी मेहनत से हर महीने लगभग 50 हजार से लेकर 60 हजार रुपये तक की कमाई कर लेते हैं। वह अलग-अलग शिल्प बाजारों, मेलों और प्रदर्शनियों में जाकर अपने उत्पादों को लोगों के सामने पेश करते हैं।

पराली के अलावा चिन्मोय गोलदार पीपल के पत्तों से भी कई आकर्षक सजावटी वस्तुएं बनाते हैं। उन्होंने बताया कि पीपल के पत्तों से कला तैयार करने की प्रक्रिया काफी दिलचस्प होती है। इसके लिए पत्तों को लगभग दो महीने तक पानी में भिगोकर रखा जाता है। इस दौरान पत्ते का हरा भाग धीरे-धीरे हट जाता है और उसके अंदर की प्राकृतिक जालीदार संरचना दिखाई देने लगती है।जब यह जाली पूरी तरह साफ हो जाती है, तब उससे विभिन्न प्रकार की कलाकृतियां और सजावटी वस्तुएं बनाई जाती हैं। यह वस्तुएं भी लोगों को काफी आकर्षित करती हैं और बाजार में उनकी अच्छी मांग रहती है।

चिन्मोय गोलदार का कहना है कि गांधी शिल्प बाजार के माध्यम से वह पहली बार हिमाचल प्रदेश आए हैं और पहली बार कुल्लू में उनका स्टॉल लगा है। उन्होंने बताया कि यहां आने के बाद उन्हें हिमाचल की प्राकृतिक सुंदरता देखने का भी अवसर मिला है।

उन्होंने कहा कि हिमाचल के बारे में उन्होंने पहले बहुत कुछ सुना था, लेकिन यहां आने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि यह प्रदेश उनकी कल्पना से भी ज्यादा खूबसूरत है। कुल्लू-मनाली की वादियां, यहां का मौसम और यहां के लोगों का व्यवहार उन्हें बेहद पसंद आया है।उनका कहना है कि हिमाचल के लोग बहुत सहयोगी और मिलनसार हैं। यहां पर स्थानीय लोग बाहर से आने वाले लोगों का भी दिल से स्वागत करते हैं और उन्हें हर तरह से सहयोग देते हैं।

चिन्मोय गोलदार का मानना है कि यदि पराली का सही उपयोग किया जाए तो यह किसानों और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। उन्होंने कहा कि पराली को जलाने से जहां वायु प्रदूषण बढ़ता है, वहीं इससे तैयार किए गए उत्पाद लोगों के लिए रोजगार का एक बेहतर माध्यम बन सकते हैं।ऐसे में जरूरत है कि इस दिशा में और अधिक प्रयास किए जाएं ताकि पराली की समस्या का स्थायी समाधान निकल सके और साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी विकसित हो सकें।

Chandrika

chandrika@summerexpress.in

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