Summer Express, बीयरूत। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच इजरायल द्वारा सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताओं को बढ़ा दिया है। ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि 3 मार्च 2026 को इजरायली सेना ने लेबनान के रिहायशी शहर योह्मोर में यह हथियार तैनात किया। इसे “सफेद कफन” भी कहा जाता है क्योंकि यह अत्यधिक घातक है और इंसान की त्वचा, मांस और हड्डियों तक को क्षतिग्रस्त कर सकता है।
सफेद फॉस्फोरस: जानलेवा हथियार
सफेद फॉस्फोरस, जिसे WP के नाम से जाना जाता है, हल्के पीले रंग का मोम जैसा रसायन है। यह ऑक्सीजन के संपर्क में आते ही 815°C तापमान पर जल उठता है। जब इसे 155 मिमी आर्टिलरी गोलों के माध्यम से हवा में छोड़ा जाता है, तो यह 100 से अधिक जलते टुकड़ों में बंट जाता है, जो 250 मीटर तक फैलकर व्यापक तबाही मचा सकते हैं।
यह हथियार सीधे त्वचा और मांस को भस्म कर देता है और हड्डियों तक को भी क्षतिग्रस्त करता है। पानी से इसे हटाने की कोशिश करने पर भी यह तुरंत फिर जल उठता है। इसके धुएँ से फेफड़े प्रभावित होते हैं और रक्त में घुलने पर लिवर, किडनी और हृदय जैसे अंग फेल हो सकते हैं। विशेषज्ञ इसे “इंसान को तड़प-तड़प कर मारने वाला हथियार” बताते हैं।
कानूनी जटिलताएँ और अंतरराष्ट्रीय विवाद
सफेद फॉस्फोरस को सीधे ‘रासायनिक हथियार कन्वेंशन’ (CWC) द्वारा प्रतिबंधित नहीं किया गया है, क्योंकि इसका प्रभाव जहर नहीं बल्कि आग है। लेकिन ‘कन्वेंशन ऑन सर्टेन कन्वेंशनल वेपन्स’ (CCW) का प्रोटोकॉल III इसे रिहायशी इलाकों में हवाई इस्तेमाल करने से रोकता है। इजरायल अक्सर तर्क देता है कि इसका इस्तेमाल केवल धुएँ का पर्दा या रात में रोशनी के लिए होता है।
विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि आबादी वाले इलाकों में ‘एयरबर्स्ट’ तकनीक से इसका इस्तेमाल सैनिकों और नागरिकों में अंतर करना असंभव बना देता है। जलते टुकड़ों की अंधाधुंध बारिश अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन है और इसे युद्ध अपराध की श्रेणी में रखा जाता है। गाजा और लेबनान में इस “सफेद मौत” ने युद्ध की क्रूरता को एक नए भयावह स्तर पर पहुँचा दिया है।