राहुल शर्मा | लुधियाना
एक ओर ग्लाडा किसी वैध कॉलोनी को मंजूरी देने से पहले करीब दो दर्जन विभागों की एनओसी, नक्शों की मंजूरी और सड़क, सीवरेज, पेयजल, बिजली व अन्य मूलभूत सुविधाओं की शर्तें पूरी करवाता है। वहीं दूसरी ओर शहर के कई इलाकों में महज दो-दो एकड़ जमीन पर धड़ल्ले से अवैध कॉलोनियां काटी जा रही हैं। हैरानी की बात यह है कि इन कॉलोनियों में प्लॉट बिक रहे हैं, मकान बन रहे हैं और आबादी भी बस रही है, लेकिन जिम्मेदार विभाग की कार्रवाई कहीं नजर नहीं आ रही। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब वैध कॉलोनी के लिए इतनी कड़ी प्रक्रिया अपनाई जाती है तो आखिर बिना मंजूरी के विकसित हो रही इन कॉलोनियों पर ग्लाडा की नजर क्यों नहीं पड़ रही? क्या विभाग को इसकी जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं?
अवैध कॉलोनियों की शिकायत जैसे ही ग्लाडा तक पहुंचती है, कार्रवाई शुरू होने से पहले ही संबंधित कॉलोनाइजरों तक इसकी भनक लग जाती है। आरोप है कि विभाग के कुछ फील्ड स्तर के अधिकारियों से सूचना लीक होने के कारण कॉलोनाइजर पहले ही अपने इंतजाम कर लेते हैं। यही वजह है कि कई मामलों में शिकायतों के बावजूद कार्रवाई प्रभावी नहीं हो पाती। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अवैध कॉलोनियों का सबसे बड़ा नुकसान सरकार के राजस्व को होता है।