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भारत में इलाज की बढ़ती लागत बनी चुनौती, सरकारी अस्पतालों को मजबूत करने की जरूरत

Summer express , नई दिल्ली। देश में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 176वीं रिपोर्ट में स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी कई गंभीर चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया गया है। एक तरफ सरकारी अस्पतालों में मरीजों की बढ़ती संख्या के मुकाबले संसाधन सीमित हैं, वहीं दूसरी ओर निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च आम परिवारों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। ऐसे में सस्ता, गुणवत्तापूर्ण और समय पर इलाज उपलब्ध कराना स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बन गया है।

भारत में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। देश का सरकारी स्वास्थ्य खर्च सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का करीब 1.5 से 2 प्रतिशत के आसपास है, जबकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में इसे 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया था। विकसित देशों में सरकारें स्वास्थ्य क्षेत्र पर जीडीपी का औसतन 9 से 11 प्रतिशत तक खर्च करती हैं। इसका सीधा असर अस्पतालों के बुनियादी ढांचे, डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ, जांच सुविधाओं और उपचार की उपलब्धता पर पड़ता है।

इलाज के खर्च का बड़ा हिस्सा भारतीय परिवारों को अपनी जेब से वहन करना पड़ता है। जहां विकसित देशों में सरकारी बीमा और नेशनल हेल्थ सर्विस जैसी व्यवस्थाओं के कारण लोगों का निजी खर्च सीमित रहता है, वहीं भारत में परिवारों को स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले कुल खर्च का करीब 40 प्रतिशत खुद उठाना पड़ता है। गंभीर बीमारी या लंबे इलाज की स्थिति में यही खर्च कई परिवारों के लिए आर्थिक संकट का कारण बन जाता है।

सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का दबाव कम करने के लिए टेलीमेडिसिन और मोबाइल क्लीनिक जैसी सुविधाओं को बढ़ावा देने की जरूरत बताई जा रही है। पूर्व आईएएस ओपी अग्रवाल के अनुसार, बड़ी संख्या में मरीज सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के लिए अस्पताल पहुंचते हैं। बुखार, सिरदर्द और अन्य सामान्य बीमारियों के शुरुआती परामर्श की सुविधा ऑनलाइन उपलब्ध कराई जाए तो अस्पतालों में भीड़ कम हो सकती है और डॉक्टरों का समय गंभीर मरीजों के इलाज में अधिक प्रभावी ढंग से लगाया जा सकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की बड़ी समस्या है। दूरदराज के इलाकों में चिकित्सकों की तैनाती और वहां लंबे समय तक उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। ऐसे में गांवों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए मोबाइल क्लीनिक को प्रभावी विकल्प के तौर पर विकसित किया जा सकता है। इससे लोगों को छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए दूर स्थित अस्पतालों का रुख नहीं करना पड़ेगा और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी मरीजों का दबाव घटेगा।

निजी अस्पतालों में इलाज की लागत और बिलिंग को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापक मेडिकल इंश्योरेंस कवरेज से मरीजों पर सीधे पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम किया जा सकता है। ऐसी व्यवस्था में अस्पताल का भुगतान सीधे बीमा कंपनी के माध्यम से किया जा सकता है और मरीज को केवल बीमा से बाहर आने वाले खर्च का भुगतान करना पड़े।

हालांकि, केवल निजी अस्पतालों को नियंत्रित करने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। लोक नीति विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लहरिया के मुताबिक, निजी अस्पतालों पर प्रभावी दबाव बनाने का सबसे बेहतर तरीका सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को मजबूत करना है। यदि जिला अस्पतालों में पर्याप्त डॉक्टर, नर्स, जांच सुविधाएं, दवाइयां और आईसीयू जैसी जरूरी सेवाएं उपलब्ध होंगी तो लोगों के पास सरकारी अस्पताल में इलाज कराने का भरोसेमंद विकल्प मौजूद रहेगा। इससे निजी अस्पतालों को भी अपनी फीस और सेवाओं की गुणवत्ता पर ध्यान देना पड़ेगा।

स्वास्थ्य व्यवस्था में सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच संतुलन बनाना भी जरूरी है। अमेरिका में मुख्य रूप से निजी स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ व्यापक बीमा मॉडल है, जबकि कनाडा में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की भूमिका अधिक है। भारत के लिए इन दोनों मॉडलों से सीख लेते हुए अपनी जरूरत के अनुसार मजबूत और किफायती व्यवस्था तैयार करने की जरूरत है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अस्पतालों के इलाज शुल्क में पारदर्शिता, मरीजों को पहले से बिल की जानकारी, जांच और उपचार की दरों को स्पष्ट करना तथा बीमा कवरेज को व्यापक बनाना जरूरी है। लेकिन इसके साथ सरकारी अस्पतालों में बिस्तरों, चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी दूर करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए केवल बड़े निजी अस्पतालों का विस्तार पर्याप्त नहीं होगा। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना, जिला अस्पतालों में आधुनिक सुविधाएं बढ़ाना और जरूरतमंद मरीजों को समय पर उपचार उपलब्ध कराना जरूरी है। सरकारी अस्पतालों की गुणवत्ता में सुधार ही वह आधार बन सकता है, जिससे आम नागरिक को निजी अस्पतालों की महंगी सेवाओं पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

आखिरकार, देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का लक्ष्य ऐसा होना चाहिए जिसमें निजी क्षेत्र अपनी भूमिका निभाए, लेकिन सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं इतनी सक्षम हों कि हर नागरिक को किफायती और गुणवत्तापूर्ण इलाज का भरोसा मिल सके। स्वास्थ्य को वास्तविक अर्थों में जनकल्याण का आधार बनाने के लिए सरकार को बजट बढ़ाने के साथ-साथ अस्पतालों के बुनियादी ढांचे और मानव संसाधन को भी मजबूत करना होगा।

Karuna

infosummerexpress@gmail.com

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