summer express , वॉशिंगटन। धरती के दो सबसे बड़े बर्फीले क्षेत्र ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका तेजी से बर्फ खो रहे हैं। नए वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, 1979 के बाद से दोनों क्षेत्रों की बर्फ की चादरों से करीब 12,500 अरब टन बर्फ पिघल चुकी है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि बर्फ पिघलने की गति इसी तरह बढ़ती रही तो समुद्र का जलस्तर और तेजी से बढ़ सकता है, जिससे दुनिया के तटीय इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
‘साइंटिफिक डेटा’ पत्रिका में बुधवार को प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, वैश्विक तापमान में वृद्धि के साथ ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फ की चादरों का आकार लगातार घट रहा है। अध्ययन में सामने आया है कि पिघलने वाली बर्फ का करीब पांच-छठा हिस्सा गर्म हवा के बजाय गर्म समुद्री पानी के प्रभाव से नष्ट हो रहा है। गर्म समुद्री पानी बर्फ की चादरों को नीचे और किनारों से कमजोर कर रहा है, जिसके कारण बड़े हिमनद टूटकर तेजी से समुद्र की ओर बढ़ रहे हैं।
अध्ययन के अनुसार, 47 वर्षों में पिघली 12,500 अरब टन बर्फ से करीब 30 लाख अरब गैलन पानी समुद्र में पहुंचा। इससे 1979 के बाद वैश्विक समुद्र स्तर में लगभग 3.1 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी हुई। वैज्ञानिकों के मुताबिक, समुद्र के स्तर में हर एक सेंटीमीटर की वृद्धि से साल में कम से कम एक बार बाढ़ की चपेट में आने वाली आबादी में करीब 20 से 30 लाख लोगों की बढ़ोतरी हो सकती है।
ग्रीनलैंड का जेकबशावन हिमनद भी तेजी से पीछे हट रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह हिमनद प्रतिदिन करीब 50 मीटर तक पीछे खिसक रहा है। अध्ययन की प्रमुख लेखिका इनेस ओतोसाका ने कहा कि आंकड़ों से स्पष्ट है कि हर दशक के साथ बर्फ की चादरों के नुकसान की रफ्तार बढ़ रही है। खासतौर पर समुद्र की ओर बहने वाली बर्फ के नुकसान में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।
इस अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में 45 स्वतंत्र सर्वेक्षणों और 27 उपग्रहों से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। नासा के उपग्रहों के आंकड़े शामिल किए जाने के बाद वैज्ञानिक अंटार्कटिका में 1979 और ग्रीनलैंड में 1972 तक बर्फ की मात्रा में हुए बदलावों का आकलन कर सके।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, इरविन के हिम वैज्ञानिक और अध्ययन के सह-लेखक एरिक रिग्नोट के मुताबिक, ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ का नुकसान बढ़ रहा है और इसके साथ वैश्विक समुद्र स्तर भी ऊपर जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बर्फ पिघलने की बढ़ती रफ्तार भविष्य में तटीय क्षेत्रों के लिए बाढ़ के खतरे को और बढ़ा सकती है।