Summer express, भोपाल। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के बुधनी वन क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने के दौरान आदिवासी परिवारों की झोपड़ियां तोड़े जाने के मामले में जांच रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल को भेजी गई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दूसरे जिलों से आए लोगों ने सागौन के पौधे काटकर वन भूमि पर कब्जा किया था। वहीं, बारेला समाज के अध्यक्ष रमेश बारेला ने रिपोर्ट को गलत बताते हुए प्रभावित परिवारों के वर्षों से वहां रहने और उनके पास दस्तावेज होने का दावा किया है।
इस मामले को लेकर राजनीतिक विवाद भी सामने आया है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके बेटे कार्तिकेय सिंह प्रभावित परिवारों के धरने में शामिल हुए थे। मंगलवार को तीसरे दिन भी वन विकास निगम के डिपो के बाहर धरना-प्रदर्शन जारी रहा। बताया गया कि शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को फोन पर मामले की जानकारी दी थी। इसके बाद मुख्यमंत्री ने जांच के आदेश दिए थे।
जांच रिपोर्ट के अनुसार, भैरूंदा तहसील के लाड़कुई परिक्षेत्र की कोसमी बीट स्थित आरक्षित वन के कंपार्टमेंट नंबर 426 में वन विकास निगम की 31.48 हेक्टेयर भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया। वर्ष 2020 में सामान्य वनमंडल से 186.960 हेक्टेयर वन भूमि वन विकास निगम के सीहोर परियोजना मंडल को हस्तांतरित की गई थी। इसके बाद निगम ने वर्ष 2021 में 135 हेक्टेयर क्षेत्र में 3,37,500 सागौन के पौधे लगाए थे।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इनमें से 78,700 पौधे काटकर 31.48 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा किया गया। गूगल अर्थ की टाइमलाइन तस्वीरों का हवाला देते हुए कहा गया है कि वर्ष 2021 तक संबंधित वन क्षेत्र खाली था। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2022 में सुनील, पुत्र शैतान, और 11 अन्य लोगों ने पौधारोपण को नुकसान पहुंचाकर वहां अस्थायी झोपड़ियां बना लीं और खेती के लिए वन भूमि पर कब्जा कर लिया।
कलेक्टर की रिपोर्ट में कहा गया है कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान जिन नौ कब्जाधारियों की झोपड़ियां हटाई गईं, उनके सिंहपुर और हबीबनगर में पहले से पक्के मकान होने की जानकारी मिली है। रिपोर्ट के अनुसार, इन लोगों के मकान नंबर और मतदाता पहचान पत्र भी दर्ज हैं। भैरूंदा के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के हवाले से कहा गया है कि भूमिहीन होने का दावा करने वाले इन परिवारों के मूल गांवों में पक्के मकान मौजूद हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि कार्रवाई के दौरान नौ झोपड़ियां हटाई गईं और एक अवैध कुएं को मिट्टी व मुरम से भर दिया गया। पूरी कार्रवाई की ड्रोन से वीडियोग्राफी भी कराई गई। प्रशासन की ओर से इन तथ्यों को वन भूमि पर अतिक्रमण की कार्रवाई के समर्थन में प्रस्तुत किया गया है।
हालांकि, बारेला समाज के अध्यक्ष रमेश बारेला ने सरकार की रिपोर्ट पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट पूरी तरह गलत है और प्रभावित परिवार वर्षों से संबंधित क्षेत्र में रह रहे हैं। उनके मुताबिक, परिवारों के पास अपने दावों के समर्थन में दस्तावेज और प्रमाण मौजूद हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार गरीब आदिवासी परिवारों को परेशान कर जबरन जमीन से बेदखल कर रही है। रमेश बारेला ने कहा कि प्रभावित पक्ष भी अपने सभी दस्तावेज और प्रमाण सामने रखेगा।
फिलहाल इस मामले में प्रशासन की जांच रिपोर्ट और प्रभावित परिवारों के दावों के बीच मतभेद सामने आए हैं। वन भूमि पर कब्जे, झोपड़ियां हटाने की कार्रवाई और परिवारों के रहने के दावों को लेकर विवाद जारी है।