Summer express/हमीरपुर, अरविंद-: प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्ता एवं पूर्व विधायक राजेंद्र राणा ने कैंसर की दवाओं के दाम में 93 प्रतिशत तक की कटौती करने के लिए केंद्र की मोदी सरकार का आभार जताया है। साथ ही उन्होंने प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर स्वास्थ्य सेवाओं और मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया है।
राजेंद्र राणा ने कहा कि केंद्र सरकार ने 543 में से 397 कैंसर दवाओं के दाम कम किए हैं। उन्होंने बताया कि पाल्बोसिक्लिब 125 एमजी, जिसकी कीमत पहले 40,421 रुपये थी, अब 2,730 रुपये में उपलब्ध होगी। इसी तरह 100 एमजी की कीमत 24,505 रुपये से घटाकर 2,069 रुपये और थायोटेपा 100 एमजी की कीमत 80,072 रुपये से घटाकर 7,150 रुपये कर दी गई है। उन्होंने कहा कि दवाओं की कीमतों में यह बड़ी कटौती कैंसर से जूझ रहे लाखों गरीब परिवारों के लिए राहत साबित होगी।राणा ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने कैंसर मरीजों के लिए दवाओं के माध्यम से इलाज को किफायती बनाने की दिशा में कदम उठाया है, जबकि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार की नीतियों के कारण मरीजों की मुश्किलें बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी अस्पतालों में पहले मुफ्त मिलने वाली सामान्य दवाइयां भी अब मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं।उन्होंने आरोप लगाया कि हिमकेयर और सहारा जैसी योजनाओं के तहत मरीजों के करोड़ों रुपये लंबित हैं। इसके चलते गरीब मरीजों को न तो समय पर कैशलेस इलाज मिल पा रहा है और न ही जरूरी दवाइयों की सुविधा। प्रदेश सरकार जनकल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी ढंग से चलाने में विफल रही है।रोबोटिक सर्जरी के मुद्दे पर भी राणा ने प्रदेश सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि करोड़ों रुपये खर्च कर रोबोटिक सिस्टम स्थापित किए गए और उद्घाटन के जरिए प्रचार किया गया, लेकिन इन्हें संचालित करने के लिए प्रशिक्षित सर्जन और जरूरी स्टाफ उपलब्ध नहीं करवाया गया। उन्होंने दावा किया कि रोबोटिक सर्जरी का खर्च लाखों रुपये होने के कारण यह आम मरीजों की पहुंच से बाहर है और मशीनों का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है।
राणा ने कहा कि प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के बजाय सरकार प्रचार पर अधिक ध्यान दे रही है। उन्होंने मांग की कि हिमकेयर और सहारा योजनाओं के लंबित भुगतान जल्द जारी किए जाएं तथा सरकारी अस्पतालों में दवाइयों, विशेषज्ञ डॉक्टरों और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, ताकि गरीब मरीजों को इलाज के लिए निजी अस्पतालों का रुख न करना पड़े।
