Summer express/धर्मशाला ,राहुल -:चीन की नीतियों के विरोध में तिब्बती समुदाय ने मैक्लोडगंज से कुरुक्षेत्र तक पांच दिवसीय पदयात्रा शुरू की है। इस अभियान के जरिए चीन के ‘एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस लॉ’ के प्रति विरोध जताया जा रहा है। आयोजकों का कहना है कि यह कानून तिब्बतियों की भाषा, संस्कृति, धर्म और विशिष्ट पहचान के लिए चुनौती है। पांच गैर-सरकारी संगठनों की पहल के तहत निकाली जा रही इस यात्रा में करीब 35 लोग हिस्सा ले रहे हैं। पदयात्री बाजारों, संस्थानों और कार्यालयों तक पहुंचकर कानून के संभावित प्रभावों की जानकारी देंगे और समर्थन जुटाएंगे।
तिब्बती महिला संगठन की अध्यक्ष त्सेरिंग डोलमा ने कहा कि चीन का यह कानून तिब्बतियों की पहचान को कमजोर करता है तथा जीवन पद्धति पर असर डालता है। उन्होंने आरोप लगाया कि तिब्बती बच्चों को बोर्डिंग स्कूलों में भेजे जाने से वे अपनी भाषा, परंपराओं और समुदाय से दूर हो रहे हैं। डोलमा के मुताबिक, तिब्बती समाज इस कानून को स्वीकार नहीं करता और अपनी पहचान की रक्षा के लिए आवाज उठा रहा है। उन्होंने बताया कि पदयात्रा के दौरान बाजारों और स्थानों पर लोगों से संवाद कर जागरूकता बढ़ाई जाएगी।निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री (सिक्योंग) पेंपा सेरिंग ने पदयात्रा को पहल बताया। उनका कहना है कि कानून का असर केवल तिब्बतियों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि उइगर और मंगोल समुदायों की पहचान पर भी इसके परिणाम पड़ सकते हैं। उन्होंने बताया कि निर्वासित तिब्बती संसद कानून की निंदा कर इसे वापस लेने की मांग कर चुकी है।
पेंपा सेरिंग के अनुसार, यात्रा का मकसद कानून पर जानकारी फैलाने के साथ भारत के लोगों और नेतृत्व का समर्थन हासिल करना है। तिब्बती प्रशासन इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए सरकारों, संसदों, थिंक टैंक और मीडिया से लगातार संपर्क करेगा। आयोजकों को उम्मीद है कि इस अभियान से तिब्बतियों की सांस्कृतिक विरासत और अधिकारों के मुद्दे पर व्यापक चर्चा होगी तथा समुदाय की चिंताओं को नीति निर्माताओं तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।