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12 साल से अस्थायी, अब स्थायीत्व की घड़ी: हिमाचल के 2,724 व्यावसायिक शिक्षक निर्णायक संघर्ष में

Shimla, 3 August

हिमाचल प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में 2013 से कार्यरत 2,724 व्यावसायिक शिक्षक अब अपने स्थायीत्व की लड़ाई के निर्णायक मोड़ पर हैं। प्रदेश के 1,690 स्कूलों में कक्षा 9 से 12 तक छात्रों को आईटी, ऑटोमोबाइल, रिटेल, हेल्थकेयर, टूरिज़्म, इलेक्ट्रॉनिक्स, ब्यूटी-वेलनेस जैसे 12 से अधिक रोजगारपरक ट्रेड्स पढ़ाने वाले ये शिक्षक पिछले 12 वर्षों से अनुबंध पर काम कर रहे हैं। न सरकारी कर्मचारी का दर्जा मिला, न कोई सामाजिक सुरक्षा।

यह सेवाएं भारत सरकार की NSQF योजना के तहत चल रही हैं, पर राज्य सरकार इनकी नियुक्ति आउटसोर्स एजेंसियों से कराती है। हालिया RTI में साफ हुआ कि राज्य सरकार ने अभी तक नियमितीकरण पर कोई स्पष्ट नीति नहीं बनाई है।

भूख हड़ताल, विरोध और वादे — लेकिन समाधान शून्य

अप्रैल 2025 में शिक्षकों ने शिमला के चौड़ा मैदान में भूख हड़ताल की, जिसके बाद सरकार ने एक कैबिनेट सब-कमेटी बनाने की घोषणा की। पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।शिक्षकों का कहना है कि हरियाणा जैसे राज्यों में व्यावसायिक शिक्षकों को प्रत्यक्ष अनुबंध पर रखा गया है, जबकि हिमाचल में वे अब भी आउटसोर्स की जंजीर में बंधे हैं।

नई शिक्षा नीति में व्यवसायिक शिक्षा अनिवार्य — पर शिक्षकों का भविष्य अधर में

NEP 2020 में कक्षा 6 से 12 तक व्यवसायिक शिक्षा को अनिवार्य बनाया गया है। ये शिक्षक छात्रों को आत्मनिर्भर बनने की स्किल सिखा रहे हैं, लेकिन उनका अपना भविष्य असुरक्षित है।

नीतियों का उद्देश्य बनाम ज़मीनी हकीकत

कौशल विकास नीति 2015 और NPSD-2009 का लक्ष्य युवाओं को स्वरोजगार और स्किल-आधारित नौकरियां देना है। लेकिन यही ट्रेनिंग देने वाले शिक्षक वेतन कटौती, अनुबंध की अस्थिरता और भविष्य की अनिश्चितता से जूझ रहे हैं।

राजनीतिक वादों की याद

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने इस योजना की शुरुआत की थी और कहा था कि कोई भी शिक्षक पूरा जीवन आउटसोर्स पर नहीं बिता सकता।
वर्तमान उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने 2022 के चुनाव में कहा था — “हमने लगाए हैं, हम ही पक्के करेंगे”, पर अब तक वादा अधूरा है।

मुख्य मांगें

  1. व्यावसायिक शिक्षकों का सरकारी कर्मचारियों के रूप में नियमितीकरण
  2. आउटसोर्स प्रणाली समाप्त कर प्रत्यक्ष अनुबंध या विभागीय समायोज
  1. अगर अब भी न हुआ निर्णय, तो संकट तय

नियमितीकरण न होने पर यह पूरा कार्यक्रम खतरे में पड़ सकता है, जिससे न केवल शिक्षा व्यवस्था, बल्कि केंद्र की योजनाओं की साख पर भी सवाल उठेंगे।

अब निर्णय का समय है

सरकार को कथनी से करनी की ओर बढ़ना होगा। शिक्षकों को सम्मान और सुरक्षित भविष्य देना, हिमाचल के शिक्षा और कौशल विकास का भविष्य बचाने के लिए ज़रूरी है.

Chandrika

chandrika@summerexpress.in

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