13 September, 2025
धार्मिक ग्रंथों और ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार, सूर्यास्त से एक घंटा पहले और सूर्यास्त के एक घंटा बाद का समय विशेष महत्व रखता है। इसे संध्याकाल या शाम का समय कहा जाता है।
संध्याकाल का आध्यात्मिक महत्व बहुत अधिक है। यह समय सूर्य देव के ढलने से लेकर अस्त होने तक का माना जाता है। प्राचीन समय में इसे गोधूली के नाम से जाना गया, और शास्त्रों में इसे 16:00 बजे से लेकर सूर्यास्त तक माना जाता है। गर्मी और सर्दी के अनुसार सूर्यास्त का समय बदलने के कारण संध्याकाल का समय भी हल्का बदलता रहता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, संध्याकाल पूजा-पाठ, ध्यान और जप के लिए अत्यंत शुभ समय है। इस समय की विशेष ऊर्जा मन और आत्मा दोनों को शांति और स्थिरता प्रदान करती है। यही कारण है कि कई धार्मिक अनुष्ठानों और दैनिक पूजा का समय इस समय को ही निर्धारित किया गया है।यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से संध्याकाल में पूजा-पाठ करता है, तो उसे मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में इसे इस समय सूर्य की आशीर्वाद शक्ति के कारण उत्तम माना गया है।इसलिए, जीवन में आध्यात्मिक अनुशासन और मानसिक संतुलन के लिए संध्याकाल का समय अपनाना अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है।